संस्कार ही सबसे बड़ी सम्पदा : आचार्य महाश्रमण

 
गंगाशहर। शनिवार सुबह तेरापंथ भवन में नियमित प्रवचन शृंखला के तहत निर्धारित विषय 'सुविनीत कौन?Ó पर व्याख्यान देते हुए आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि जो विनीत होता है उसे सम्पदा मिलती है और अविनीत होता है उसे विपदा। जो विद्यार्थी इस बात को समझले वह शिक्षा प्राप्त कर लेता है। माता-पिता अपनी संतान को छोटी उम्र में ही विद्या संस्थान भेज देते हैं। वे सोचते हैं कि ज्यादा वर्ष तक विद्या संस्थान में रहेगा तो आत्मनिर्भर बनेगा, कमाई के लायक बन पाएगा। ऐसी उम्मीद रखकर अभिभावक अपने बच्चों को शाला भेजते हैं लेकिन यदि वह शिक्षण संस्थान उन्हें संस्कार और ज्ञान नहीं देता है तो वह संस्थान असफल है। आचार्यश्री ने कहा कि आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला शत्रु है और परिश्रम के समान कोई बंधु नहीं। सुविनीत वही हो सकता है जिसमें अच्छे संस्कार हो, जो शिष्य गुरु की आज्ञा का पालन विनम्रता से करता है। गुरु के साथ-साथ सभी से शिष्टव्यवहार हो। जो स्वभाव से शांत होता है और दूसरों को सम्मान देता है, दूसरों की अधीनता में भी औचित्य के साथ रहे वैसा व्यक्ति सुविनीत होता है। सुविनीत वह होता है जिसके विचार सादगी और उन्नत भरे हो। विचारों में उच्चता और जीवन में सादगी से व्यक्ति संस्कारी होता है। विद्यार्थी को विद्या के क्षेत्र में बेईमानी से बचना चाहिए। गोपालकृष्ण गोखले की बाल्यकाल की कहानी सुनाते हुए महाश्रमणजी ने कहा कि प्रामाणिकता और प्रतिभा से ही व्यक्ति महान् बनता है।  संस्कारों की सम्पदा के सामने धन-वैभव बौने हो जाते हैं। शुद्ध बुद्धि कामधेनू की तरह होती है। बुद्धि और शुद्धि दोनों बहनें हैं, ये साथ में रहनी चाहिए। बच्चे समस्या पैदा करने वाले नहीं बल्कि समाधान करने वाले बच्चे बनें तभी भारत का विकास होगा।
आचार्यश्री महाश्रमणजी के प्रवचन से पूर्व 'संस्कार समृद्धिÓ विषयक कार्यशाला तेरापंथ किशोर मंडल द्वारा आयोजित की गई। कार्यशाला में जैन गल्र्स कॉलेज के वाणिज्य व्याख्याता डॉ. धनपत रामपुरिया ने कहा कि धरती पर जितने जीव हुए हैं उनमें मनुष्य को श्रेष्ठ माना गया है। श्रेष्ठकर्मों का परिणाम ही होता है जो हमें मनुष्य जन्म मिलता है और यह जन्म श्रेष्ठ इसलिए होता है क्योंकि सोचने-समझने की ताकत केवल मनुष्य में ही होती है। मनुष्य में बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था तथा वृद्धावस्था आती है और इसीके अनुरूप वह शरीर का विकास और बुद्धि का विकास होता है। विकास शून्य से शिखर तक होता है। तेरापंथ समाज में ज्ञान शाला जिसमें बच्चों को व्यवहार सिखाया जाता है, उठना, बैठना, जैन-जीवन शैली जीना सिखाया जाता है। किशोरावस्था केनवास की तरह होता है उसमें जो रंग, जो आकृति उकेर दी जाए वही निखर जाती है। इसलिए किशोर मंडल में संस्कार सिखाए जाते हैं। सरोजनी नायडू, रविन्द्र नाथ टैगोर जैसे महान् पुरुष भी किशोरावस्था से ही संस्कारी रहे। युवावस्था में आचार होना जरुरी है। रामपुरिया ने कहा कि किशोरों यदि क्रांतिपुरुष बनना है तो कार नहीं संस्कार अपनाएं, व्यापार से पहले व्यवहार धारण करें। महाश्रमणजी विनय-संस्कार से भरे हैं। विनय की प्रतिमूर्ति हैं। बिन्दू से सिन्धु को प्राप्त करना है तो विनम्रता आवश्यक है। पहाड़ पर चढ़ते समय हमें झुकना पड़ता है और सिर ऊपर रखकर ही उतरा जाता है। कहने का मतलब है शिखर पर चढऩा है तो झुकना पड़ेगा। संस्कारी और विनयी होना होगा। मानवोचित्त व्यवहार ही संस्कार कहलाता है। कार्यशाला का संचालन दिनेश सोनी ने किया। कार्यशाला से पूर्व मनोज छाजेड़ ने गीतिका प्रस्तुत की।
अपने उद्बोधन में मंत्री मुनिश्री सुमेरमल स्वामी ने कहा कि जीवन के प्रारंभ में संस्कार सबसे पहले आते हैं और शिक्षा बाद में। सीखा हुआ ज्ञान भूल सकते हैं लेकिन अपनाए हुए संस्कार जिंदगीभर रहते हैं। जीवन में संस्कार जन्म से मिलते हैं लेकिन मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि संस्कार गर्भ में ही प्राप्त कर लिए जाते हैं। इसलिए माताओं को चाहिए कि गर्भवती होने के साथ ही उदार, सत्यनिष्ठा, संयमशीलता को व्यवहार में लाएं। जैसा भी व्यवहार आप करेंगी उसका असर आपके गर्भ पर पड़ेगा। बच्चा जब पैदा हो जाता है, पालने में झूलता है और घर में यदि झगड़ा चल रहा हो एवं गालियां निकल रही हो तो वह पालने में झूलता हुआ बच्चा झगड़ा-गाली ही सीखेगा और ऐसे माहौल में संस्कार नहीं कुसंस्कार प्राप्त करेगा।  बच्चों की पहली पाठशाला उसका घर ही होता है। संस्कार वही दे सकता है जिसका जीवन संस्कारी हो। जिस व्यक्ति में धार्मिक संस्कार है वह धन, वैभव सब ठुकरा सकता है। बेईमानी से आए हुए धन की जड़ नहीं होती, जड़ होती है ईमानदारी, धर्म, नैतिकता की। छल-कपट, किसी को दुखी करके कमाया हुआ धन सुख नहीं विपदा लाता है।

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