जहां स्वीकारने की परम्परा हो वहां अनुशासन रहता है : महाश्रमण


 
गंगाशहर। बुधवार को तेरापंथ भवन में आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा है कि जहां संगठन होता है वहां शासन अनुशासन की अपेक्षा होती है। भारत में पहले राजतंत्र था, राजा-महाराजा का शासन था लोग अनुशासन में रहते थे वर्तमान में लोकतंत्र प्रणाली है। जनता का राज है लेकिन शासन तो अनुशासन से ही चलता है। कैसी भी व्यवस्था हो, किसी भी रूप में व्यवस्था हो लेकिन विकास तभी संभव है जब अनुशासन शासन हो। आचार्यश्री महाश्रमण ने 'शासन अनुशासनÓ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि एक नियामक-निदेशक होना चाहिए, जो हमारा मार्गदर्शन कर सके। जहां सब नेता बन जाए, पंडित बन जाए सब अपने आप को महत्वकांक्षी समझने लगे तो राष्ट्र का दुखी होना स्वाभाविक है। इसलिए हर किसी को अनुशास्ता नहीं बनाया जा सकता। आचार्यश्री ने कहा कि जो स्वयं अच्छा शिष्य नहीं बन सकता वह कभी किसी का गुरु भी नहीं बन सकता। अच्छे गुरु का दृष्टिकोण भी शिष्य के प्रति अच्छा होना आवश्यक है। गुरु अपने शिष्य को अनुशासन में रहकर पिता की तरह, बड़े भाई की तरह ज्ञान देता है तब शिष्य की दृष्टि में गुरु श्रेष्ठ हो जाता है। तेरापंथ में आचार्यों की आज्ञा का महत्व है। आज्ञा में रहना, आज्ञा के प्रति परम सम्मान की भावना होनी चाहिए। गुरु़ का आदेश आ गया तो उस दिशा में बढ़ जाओ। कठिनाइयां आए तो आती रहे लेकिन गुरु के आदेश का पालन मजबूत मनोबल से करें। गुरु जिसको उत्तराधिकारी नियुक्त कर दे उसे सबको स्वीकार करना होता है। जहां स्वीकारने की परम्परा चलती है वहां व्यवस्था अनुशासित रहती है। 
व्याख्यान के बाद उपस्थित साधु-साध्वियों ने आचार्यश्री के समक्ष हाजरी दी तथा मर्यादा लेखपत्र का वाचन किया। महाश्रमणजी ने साधु-साध्वियों से कहा कि २०१५ में नेपाल, २०१६ में असम, २०१७ में......... चातुर्मास घोषित किया जा चुका है तथा २०१८ में चातुर्मास दक्षिण क्षेत्र में करने के बारे में साधु-साध्वियों से चर्चा की। इससे पूर्व मुनिश्री दिनेश कुमार ने प्रवचन देते हुए कहा कि श्रावक बनने का अवसर मिला है तो संयम पालने में अग्रसर रहें। मनुष्य हो तभी तो संयम पालन कर सकते हो। मानव जीवन में रहकर भी यदि संयम का पालन नहीं किया तो आगे कभी अवसर नहीं मिलेगा। नैतिकता, आचार और संयम जैसे तत्व से ही व्यक्तित्व में विकास होता है।

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