जिनशासन के अनूठे साज का नाम है “आचार्य महाश्रमण” – साध्वी अणिमा श्री

कोलकाता साध्वी श्री अणिमा श्री जी एवं साध्वी श्री मंगलप्रज्ञा जी के सान्निध्य में लेकटाउन में गोकुल बेंक्वेट हाल में आचार्य श्री महाश्रमण जी का जन्म एवं पदाभिषेक कार्यक्रम भव्य एवं विशाल उपस्थिती में समायोजित हुआ ।



प्रारम्भ में पूर्वाञ्चल तेरापंथी सभा के तत्वाधान में शानदार अणुव्रत रैली निकाली गई और कार्यक्रम स्थल पर अभीवंदना कार्यक्रम परिणत हो गई ।






साध्वी श्री अणिमा श्री जी ने अपने हृदयोद्गार वक्तव्य करते हुए कहा – जिनकी एक मुस्कान सारी थकावट दूर कर देती है, जिनकी पवित्र वाणी जन-जन को ऊर्जावान बना देती है । जिनकी साधना है व्यक्ति पर अमिट प्रभाव की रेखा अंकित कर देती है । जिनका प्रखर पराक्रम प्राणवक्ता का संचार कर देता है । जिनका पुनीत आभामंडल आसपास को सहज ही अनुप्राणित कर देता है, ऐसे है तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी । चिन्मय चेतन की मुस्कान के साथ जो मुस्कुराता है, उसका नाम है – आचार्य महाश्रमण जी । 


जिन्दगी के हर अंधरे मोड़ पर ज्योति प्रज्वलित कर पंथ दिखाता है उसका नाम है आचार्य महाश्रमण जी । थके कदमों में अभिनव उत्साह का संचार कर अंगुली थाम कर चलता है, वह है आचार्य महाश्रमण जी । मानसिक उद्वेलन के भंवर में फंसी जीवन किश्ती को आनंद के किनारे ले जाता है वह है आचार्य श्री महाश्रमण । माँ नेमा का बाल, दुगड़ कुल का भाल आज तेरापंथ का भाल बन कर चमक रहा है । ऐसे व्यक्तित्व विरल होते है जो अपने व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व के आधार पर नेतृत्व के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाते है, उन विरल व्यक्तियों में एक नाम है आचार्य महाश्रमण । आचार्य श्री महाश्रमण जी तेरापंथ धर्मसंघ की कमनीय अनुपमेय कृति है जिन्हें आचार्य तुलसी ने तराशा एवं आचार्य महाप्रज्ञ ने तेरापंथ का कोहिनूर बना दिया । तेरापंथ के कोहिनूर आचार्य महाश्रमण जी आज पूरे धर्मसंघ को ही नहीं मानव – जाती को आभामंडित कर रहे है । जिन शासन के भाल, युगों – युगों तक करो शासन की संभाल।
इसी मंगल कामना के साथ .....






     

 साध्वी श्री मंगलप्रज्ञा जी ने अभिवंदना के स्वर प्रस्तुत करते हुए कहा – आदर्श वही बन सकता है जो निर्मल होता है, जो गतिशील होता है, जो उपयोगी होता है। आचार्य श्री महाश्रमण जी पवित्रता के पुञ्ज है, निर्मलता के निर्झर है । उनके जीवन में साधना की तेजस्विता है, भावों की निर्मलता है, विचारों में पवित्रता एवं चिंतन में गंभीरता है । वे हर क्षण गतिशील रहते है । केवल पदयात्रा से गतिशील नहीं है मर्यादा से गतिशील है, अनुशासना व साधना के पथ पर गतिशील है। वे पूरे धर्मसंघ की ढाल बने हुए है इसलिए उपयोगी ही नहीं महाउपयोगी है । इसलिए वे सृष्टि के कण-कण के लिए आदर्श बने हुए है, आदर्श पुरुष है ।





 
 


साभार : जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा (कोलकाता – पूर्वाञ्चल), श्री भूपेंद्र जी श्यामसुखा, श्री विनोद जी मनोत, श्री विक्रम जी दुधोड़िया


जैन तेरापंथ न्यूज़ ब्युरो कोलकाता से पंकज दुधोड़िया, सोनम नाहटा, विकास चोरडिया, बरखा गीडिया, शशांक सुराना, गीतिका बांठिया की रिपोर्ट । 

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