अणुव्रत अनुशास्ता, गणाधिपति परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री तुलसी के महाप्रयाण दिवस पर जैन तेरापंथ परिवार की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजली




संपादकीय


अणुव्रत अनुशास्ता, गणाधिपति परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री तुलसी के 
महाप्रयाण दिवस पर जैन तेरापंथ परिवार की ओर से भावांजली ।

दीर्घद्रष्टा गुरुदेव श्री तुलसी का विरल व्यक्तित्व, तेजोमय आभामंडल व प्रसन्न मुखमुद्रा जन-जन को आकर्षित करने वाला था।

भारत देश की आज़ादी के बाद भी देश रुढीचुस्त परम्परा से प्रभावित था। ऐसे समय पर पूज्य गुरुदेव ने अणुव्रत का सन्देश दे कर पुरे भारत भर में मानव को मानव बनाने के लिए अथक परिश्रम किया, जिनका मानना था 
"इन्सान पहले इन्सान, फिर हिन्दू या मुसलमान" 

ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी आचार्य श्री तुलसी के हम जीतने गुण गान करे, वह कम है । 


आज आचार्य श्री तुलसी के महाप्रयाण दिवस पर सभी भाई-बहिनों से विनम्र निवेदन है की हम सब "अणुव्रत" का कोई भी एक संकल्प स्वीकार कर युगपुरुष गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी को अपनी सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करे ।





गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी

सन् 1914 में कार्तिक शुक्ल दूज को चंदेरी (लाड़नूं) की धरती पर जन्म लेने वाले आचार्य तुलसी ने 11 वर्ष की उम्र में भागवती दीक्षा स्वीकार कर जैन आगमों का एवं भारतीय दर्शनों का गहन अध्ययन किया। अपने 11 वर्षीय मुनिकाल में 20 हजार पदों को कंठस्थ कर लेना, 16 वर्ष की उम्र में अध्यापन कौशल में पारंगत हो जाना। 22 वर्ष में तेरापंथ जैसे विशाल धर्म संघ के दायित्व की चादर ओढ़कर 61 वर्षों तक उसे बखूबी से निभाई। ऐसे महान सं‍त का महाप्रयाण दिवस है। 

लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूरी।
चींटी ले शक्कर चली, हाथी के शिर धूरी॥

कवि की इन पंक्तियों का जीवन निदर्शन है आचार्य तुलसी का जीवन। लघुता से प्रभुता के पायदानों का स्पर्श करते हुए चिरंतरन विराटता के उत्तुंग चैत्य शिखर का आरोहण कर गणपति से गणाधिपति गुरुदेव तुलसी के रूप में विख्यात नमन उस गण गौरीशंकर को, जिसने गुरुता का विसर्जन कर वस्तुतः गुरुता के उस गौरव शिखर का आरोहण कर लिया, जहां पद, मद और कद की समस्त सरहदें सिमटकर लघुता से प्रभुता में विलीन हो गईं।

सचमुच कितना महान था वह मस्ताना फकीर। जब नेतृत्व की संपूर्ण क्षमताओं के बावजूद अपने उत्तराधिकारी आचार्य महाप्रज्ञ में आचार्य पद संक्रांत कर आचार्य तुलसी ने पद विसर्जन का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। 

18 फरवरी 1994, सुजानगढ़ का विशाल धर्म प्रांगण! कितना अपूर्व था वह क्षण जब आचार्य श्री तुलसी ने अपने 60 दशक के तेजस्वी प्रशासन को एकाएक अलविदा कहकर उत्कृष्ट आत्म-साधना का निर्णय लिया। उनकी इस उद्घोषणा के साथ मानव समाज चौंक उठा। पद त्याग के इस क्रांतिकारी कदम ने नाम, यश, पद और प्रतिष्ठा की भीषण विभीषिका से त्रस्त राजनीतिक एवं धार्मिक जगत में तहलका मचा दिया। 

अपने शिष्य को आचार्य के रूप में स्वीकार कर गुरुता का सर्वाधिकार सौंपना विलक्षण है! अहम विसर्जन की इस दुर्लभ घटना ने आचार्यश्री तुलसी को अध्यात्म के उस उच्च व्यास पीठ पर अधिष्ठित कर दिया जहां राष्ट्रसंत लोकरत्न, भारत ज्योति जैसे ढेरों अलंकरण व उपाधियां, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार, हकीम खांसूर जैसे संबोधन उनकी संतता की निर्मल आभा के सामने स्वयं गरिमा मंडित हो उठे। 

20 अक्टूबर 1914 कार्तिक शुक्ला दूज चंदेरी (लाड़नूं) की धरती पर उगने वाले इस दूज के चांद ने अनुयायियों को ठंडक महसूस कराई वहीं सूरज की तरह तपना भी सिखाया। 22 वर्ष की उम्र में तेरापंथ जैसे विशाल धर्म संघ के दायित्व की चादर ओढ़कर 61 वर्षों तक उसे बखूबी से निभाना तथा इस दौरान स्वयं तरक्की का सफर तय करते हुए अपने संपूर्ण धर्म संघ को युग की रफ्तार के साथ मोड़ देना उनकी जबरदस्त प्रशासनिक क्षमता, प्रतिभा, सूझबूझ का परिचायक है। 

उन्होंने 34 वर्ष की उम्र में जहां अणुव्रत आंदोलन का सूत्रपाद किया। वहीं तनावमुक्ति को लिए प्रेक्षाध्यान, चारित्रिक विकास के लिए शिक्षा में जीवन विज्ञान जैसे व्यापक आयामों का अवदान देकर सच्चे अर्थों में महान युग प्रवर्तक की भूमिका अदा की।

ऐसे महान संत को नमन।


साभार : सलिल लोढ़ा
प्रस्तुति : जैन तेरापंथ न्यूज़ से पंकज दुधोडिया

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