अहंकार करता है विनय का नाश: आचार्य श्री महाश्रमण


दिल्ली। पूज्य आचार्य श्री महाश्रमणजी ने आज लक्ष्मीनगर में उपस्थित धर्मसभा को पावन पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि-  आदमी के भीतर वृतियों का एक समूह विद्यमान है। उनमे से एक वृति है अहंकार और मान। अहंकार वो तत्व है जो विनय का नाश करनेवाला है। अभिमान कह दे, अहंकार कह दे, मान कह दे, गर्व कह दे, एकार्थक चीजे है। अभिमान मदिरापान के सामान है, मदिरापान है। ये गौरव, गर्व और रौरव नरक के समान है, इन तीनों को छोड़ कर आदमी सुखी बने। कुछ प्राप्त हो जाता है तो कई बार आदमी अहंकार ग्रस्त हो जाता है। ऐश्वर्य मिल गया, सत्ता  हाथ में आ गयी तो आदमी मदान्ध बन जाता है हालांकि सब बने ये आवश्यक नहीं है लेकिन सत्ता में मदान्धता हो सकती है। 

आदमी के पास धन आ जाता है, धन भी घमंड का कारण  बन सकता है। एक आदमी के पास धन आ गया और वो धन का परित्याग नहीं कर सकता वह दरिद्र बन जाता है। आचार्य  भिक्षु के समक्ष किसी ने कहा- जिसके पास कुछ नहीं होता वह निर्धन होता है उसे दरिद्र कहा जाता है। परन्तु भिक्षु स्वामी ने पद में नयी बात कही । वह पद इस प्रकार है - 

घर में धन पिण दरिद्री इत्ती ना देवे दान,
भारभूत धन तेहरो कोरो करे गुमान।।

घर में धन है, वास्तु है, पदार्थ है, सब कुछ होने पर भी जो दान नहीं करता है, पदार्थासक्त बना रहता है । वो मोह का जवाब देता है या धन को हाथ का जवाब नहीं देता वह व्यक्ति पैसा होते हुए भी दरिद्र है, मतलब उदारता की दृष्टि से दरिद्र है। उसका धन भारभूत है और वह व्यक्ति  अहंकार करता है धन का, पर धन का सम्यग प्रयोग नहीं कर पाता। धन का परित्याग भी नहीं कर पाता तो धन का भी घमंड हो जाता है।

पूज्यप्रवर ने फरमाया- 'मेरे तीन परामर्श है धनवानों के लिए:-
1. आप पास जो धन है उसका घमंड मत करना, अभिमान मत करना।
2. धन के प्रति आसक्ति मत करना।
3. धन का दुरूपयोग मत करना।

अहंकारी आदमी दूसरों की अधीनता में नहीं रहना चाहता, दूसरों को अधीन रखना चाहता है। धन का दान देने वाला भी दाता नहीं, दूसरों को मान सम्मान देने वाला बड़ा डाटा है।
जो स्वयं अच्छा शिष्य है वह अच्छा गुरु नहीं हो सकता। दूसरों पे अनुशासन से पहले स्वयं अनुशासित बने। आदमी को अर्हता का विकास करना चाहिए। सम्मान का आकांक्षी नही बनना चाहिए। अर्हता होती है तो सम्पदा भी आ जाती है। आदमी अहंकार को छोड़े और विनय को धारण करने का प्रयास करे।

Related

Pravachans 5201693148900045309

Follow Us

Hot in week

Recent

Comments





Total Pageviews

item