चातुर्मास है आत्मा के अभ्युदय का अवसर : आचार्य महाश्रमण

चातुर्मास का शुभारंभ एवं श्रावण मास आत्मा के अभ्युदय का अवसर है, यह एक तपोयज्ञ का अवसर है, जिसमें सिर्फ शरीर ही नहीं, मन, इन्द्रियां कषाय सभी कुछ तपते है। ‘अनशन’ निश्चित ही स्पृहणीय, करणीय और अनुमोदनीय तप है। उपवास, बेला (दो दिन का उपवास), (तीन दिन का उपवास) आदि तपस्याएं उसके अंतर्गत हैं। श्रावण-भाद्रव मास में जैन लोग विशेष रूप से तपस्या का प्रयोग करते हैं। यथाशक्ति, यथास्थिति वह होना भी चाहिए। कुछ लोग शारीरिक दौर्बल्य अथवा अन्य करणीय कार्यों की व्यस्तता के कारण प्रायः तपस्या नहीं कर सकते, उन्हें निरुत्साह होने की जरूरत नहीं। उन्हें ‘ऊनोदरी’ पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
निर्जरा के बारह भेदों में दूसरा भेद है ऊनोदरी। उसे ऊनोदरिका, अवमौदर्य अथवा अवमोदरिका भी कहा जाता है। ‘ऊन’ का अर्थ न्यून, कम। उदर का अर्थ है पेट। उदर को ऊन रखना, खाने में कमी करना ऊनोदरी तप है। ऊनोदरी  का यही अर्थ अधिक प्रचलित एवं प्रसिद्ध है। वहां ऊनोदरी के दो प्रकार बतलाए गए हैैैं- पहला द्रव्य अवमोदरिका एवं दूसरा भाव अवमोदरिका। अवमोदरिका का तात्पर्य है अल्पीकरण अथवा संयम। द्रव्य अवमोदरिका का अर्थ है उपभोग-परिभोग में प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों-भौतिक पदार्थों का संयम करना। भाव अवमोदरिका का संबंध हमारे अंतर्जगत् से है, भावों (इमोशन्स्) से है, निषेधात्मक भावों (नेगेटिव एटिच्यूड्स) के नियंत्रण से है।
द्रव्य अवमोदरिका के भी दो प्रकार हैं- पहला उपकरण द्रव्य अवमोदरिका एवं दूसरा भक्तपान अवमोदरिका। वस्त्र, पात्र आदि उपकरणों कासंयम करना उपकरण द्रव्य अवमोदरिका एवं खान-पान में संयम करना भक्तपान द्रव्य अवमोदरिका है।
यह अवमोदरिका जहां जैन तपोयोग का एक अंग हैं वहीं अनेक व्यावहारिक समस्याओं का समाधान भी है। कुछ लोग अनावश्यक खाते हैं, मौज उड़ाते हैं और बीमारियों को अपने घर (शरीर) में लाकर रहने के लिए निमंत्रण देते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें क्षुधाशांति के लिए पर्याप्त खाद्य सामग्री भी नहीं मिलती है। वे कष्ट का जीवन जीते हैं। अति भाव और अभाव की इस विषम स्थिति में संतुलन हो जाए तो दोनों ओर की समस्या का समाधान हो सकता है। इसी प्रकार वस्त्र, मकान, यान-वाहन आदि की बहुलता और अभव की विषम स्थितियां हैं। उनके समीकरण में ऊनोदरी का सिद्धांत प्रकाश-स्तंभ के रूप में हमारे सामने है। उसको युक्ति-युक्त समझना, समझाना अपेक्षित है।
लड़का भरपेट भोजन कर उठा ही था कि मित्र के घर से प्रीतिभोज में भाग लेने के लिए निमंत्रण मिला। वह अपने वृद्ध पिता के पास जाकर बोला-‘पिताश्री! खाना इतना खा लिया है कि न तो उद्गार (डकार) हो रहा है और न ही अधोवायु का निस्सरण। और भोजन के लिए निमंत्रत किया गया हूं। आप बताये क्या करूं?’
पिता ने कहा-‘पुत्र! प्राणों की चिन्ता मत करो, जाओ भोजन करो। मुफ्त का भोजन कब-कब मिलता है? शरीर तो अगले जन्म में फिर मिल जाएगा। 
पिता की यह व्यंग्य प्रेरणा उपभोक्तावादी संस्कृति में पलने वालों के लिए एक बोध-पाठ है। भाव अवमोदरिका द्रव्य अवमोदरिका से कहीं अधिक मूल्यवान् है। उसके उतने ही प्रकार हो सकते हैं जितने मनुष्य के निषेधात्मक भाव होते हैं। आगम में उसके सात प्रकार मिलते हैं-
अल्पक्रोध- क्रोध का प्रतनु (पतला) करना, क्षमा का प्रयोग करना।
अल्पमान- अहंकार को प्रतनु करना, विनम्रता का प्रयोग करना।
अल्पमाया- छलना का परिहार करना, सरलता का विकास करना।
अल्पलोभ- इच्छा, लालसा का संयम करना, संतोषी वृत्ति अपनाना।
अल्पशब्द- अनपेक्षित और दूसरों को बाधा पहंुचाने वाली भाषा का प्रयोग न करना।
अल्पझंझा- कलह का अर्जन करना, कोपाविष्ट होकर शब्दों की बौछार न करना।
अल्पतुमंतु- तिरष्कारपूर्ण ‘तू-तू’ शब्दों का प्रयोग न करना।
इस प्रकार क्रोध आदि को अल्प करना भाव अवमोदरिका है। भावशुद्धि के लिए इसकी साधना आवश्यक है।
भाव अवमोदरिक तो कठिन है ही, द्रव्य अवमोदरिका भी सबके लिए आसान नहीं है। जिह्ना-संयम सधे बिना वह अनुष्ठित नहीं हो सकती।
एक बहुभोजी व्यक्ति संत के पास गया और बोला-आप अनुभवी हैं, बताइए मैं कौन-सी दवा लूं जिससे भोजन ठीक तरह से पच जाए? संत ने कहा-जब तक एक दवा नहीं लोगे, और दवा क्या काम करेगी? वह दवा है ऊनोदरी। तुम ज्यादा खाते हो और पाचन-क्रिया को खराब करते हो। ऊनोदरी करो, कम खाओ, पाचन के लिए यह सर्वश्रेष्ठ दवा है।
ऊनोदरी शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जहां लाभदायक है वहीं आध्यात्मिक साधना के विभिन्न अंगों की सम्यक् आराधना में भी वह सहायक बनती है। दिगम्बर-साहित्य में कहा गया है-क्षमा, मुक्ति आदि दस धर्माें की साधना, सामायिक आदि आवश्यकों की आराधना, योग, स्वाध्याय और इन्द्रिय-नियंत्रण में ऊनोदरी तप सहायक बनता है। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ऊनोदरी तप किया जाना चाहिए।
‘ऊनोदरी’ शब्द ‘थोड़ा’ का अर्थ देने वाला है। साधु-जीवन निश्चिंतता और अनिश्चिंतता का जीवन है। निश्चिन्तता इस रूप में कि वहां कोई चिन्ता नहीं होती। भिक्षा में कल क्या मिलेगा? यह चिन्ता साधु नहीं करता। आज जो उपलब्ध है उसी में वह संतुष्ट रहता है, साधना में तल्लीन होकर आत्मानन्द का जीवन जीता है। अनिश्ंिचतता इस रूप में कि मुनि को कभी सरस, कभी विरस, कभी ठंडा और कभी गरम, कभी पर्याप्त और कभी अपर्याप्त भोजन मिलता है। इसीलिए यह कहा जाता है-‘‘कदेइ घी घणां, कदेइ मुट्ठी चणां’’ कभी भोजन नहीं भी मिलता है और कभी अल्प मिलता है। मुझे स्मरण है भिक्षा में आहार कम उपलब्ध होने पर एक हमारे स्थविर संत बहुधा एक सूत्र दोहराया करते थे-‘थोड़े मैं गुण घणां’-कम में बहुत गुण होते हैं। आहार कम होगा तो ऊनोदरी तप होगा, पाचनक्रिया ठीक रहेगी। वस्त्र कम हैं तो उनके प्रतिलेखन और प्रक्षालन में समय कम लगेगा। बातों की आदत कम है तो स्वाध्याय ध्यान में अधिक संलग्नता होगी।
भोजन के साथ विभिन्न प्रकारों से ऊनोदरी को जोड़ा जा सकता है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
अल्प मात्रा- भोजन की मात्रा कम करना। कुछ भूख रहे उसी स्थिति में भोजन छोड़ देना।
अल्प द्रव्य- भोजन में द्रव्यों की सीमा करना, नौ, ग्यारह, पन्द्रह आदि द्रव्यों से अधिक न खाना।
अनध्यशन- बार-बार न खाना। एक बार प्रातराश अथवा भोजन के बाद चार-पांच घंटे तक कुछ भी न खाने का संकल्प करना, प्रहरतप करना, रात्रि भोजन न करना, प्रातः नमस्कार संहिता (नवकारसी) आदि करना। 
उपवास में तो खाना सर्वथा छूट जाता है पर भोजन करते समय खाने का संयम करना, जिह्ना पर नियंत्रण रखना भी एक कठिन समस्या है। द्रव्य ऊनोदरी और भव ऊनोदरी (क्रोध, लोभ आदि का परिहार) की साधना चले हम मोक्ष की ओर गतिमान् प्रगतिमान हो सकते हैं। उस स्थिति में शारीरिक दौर्बल्य आदि के कारण बड़ी तपस्या का न होना भी मोक्ष में बाधक नहीं बनता। इस महामहिम ऊनोदरी तप के व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह कहना असंगत नहीं लगता कि ‘खाते-पीते मोक्ष’ संभव है। प्रस्तुतिः ललित गर्ग

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