धर्म कभी न बने युद्ध एवं अशांति का कारण : आचार्य महाश्रमण









    13 जुलाई, 2014। नई दिल्ली। अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में अध्यात्म साधना केन्द्र के वर्धमान सभागार में अणुव्रत विश्व भारती द्वारा आयोजित ‘'शांति के लिए अंतः धार्मिक समझ एवं सहयोग पर राष्ट्रीय संवाद’’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में आचार्यश्री महाश्रमण ने सम्मेलन में उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारत एक ऐसा देश है जहां विभिन्नता में एकता है, यहां भिन्न-भिन्न भाषा, भिन्न धर्मों के जैन, बौद्ध, सिक्ख, ईसाई, मुस्लिम आदि सभी धर्मों के लोग रहते हैं। भारत में अनेक जातियां, संप्रदाय हैं यहां अनेकता में एकता की विशेषता है। एकता का आधार बिन्दु अहिंसा भाव, मैत्री भाव है। भारत के सभी धर्मगुरु अपने अनुयायियों को नैतिकता, शांति, अहिंसा और मैत्री के रास्ते पर चलाने का पाठ पढायें। धर्म कभी युद्ध का, अशांति का कारण न बने। धर्म शांति और सौहार्द का कारण बने, सब सम्प्रदायों का मालिक एक है ‘सत्य’ सत्य के अनन्त आकाश में उड़ान भरने के लिए अनेकान्त के पंखों की जरूरत है। सन्त महर्षियों को भूमि भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान का खजाना रही है। भारत को पुनः स्वर्ग बनाने के लिए सर्वधर्म सद्भाव बहुत जरूरी है।

    मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष मुक्तार अब्बास नकवी ने कहा भारत में अणुव्रत जैसा नैतिक अहिंसक अभियान चल रहा है। यह हमारी ताकत है हम इसे आगे बढायें और इराक जैसी समस्याओं से बैचेन विश्व को अणुव्रत आंदोलन के माध्यम से शांति का संदेश दें।

    पेनलिस्ट वक्ता के रूप में ‘बहाय’ आध्यात्म्कि सभा दिल्ली के अध्यक्ष ए.के. मर्चेन्ट, बौद्ध तिब्बत सदन के निर्देषक ‘दोरजीदमदुल’, यहूदी धर्म शिक्षा स्थल के सचिव ‘इजाक मालेकर’ ईसाई समुदाय राष्ट्रीय संघ के निदेशक एम.डी. टामस ने अपने प्रभावी विचार रखे। वर्श 2013 का अणुव्रत अहिंसा अंतर्राश्ट्रीय शांति पुरस्कार प्रख्यात गांधीवादी विचारक एकता परिशद् के अध्यक्ष पी.वी. राजगोपाल को दिया गया। कार्यक्रम का संचालन एस.एल. गांधी ने किया। अतिथियों का स्वागत अणुविभा के अध्यक्ष टी.के. जैन ने किया।

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