अपने से अपना अनुशासन ही अणुव्रत : आचार्य श्री महाश्रमण

65वें अणुव्रत अधिवेशन के दुसरे दिन के पंचम सत्र में पूज्य गुरुदेव का सानिध्य प्राप्त हुआ।देशभर से लगभग 250 अणुव्रत कार्यकर्ता अधिवेशन में उपस्थित रहे। विश्व हिन्दू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंघल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।स्वागत व्यक्तव्य अणुव्रत महासमिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री डालचंद कोठारी ने दिया।राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में अणुव्रत का योगदान विषय पर विश्व हिन्दू परिषद् के राष्ट्रिय उपाध्यक्ष श्री नायकजी और राष्ट्रिय अध्यक्ष श्री अशोक सिंघल ने अपने विचार रखे।मुख्य वक्ता के रूप में डा. ओमप्रकाशजी पाण्डेय(साईंन्टिस्ट) उपस्थित रहे।श्री अशोक सिंघल ने अपने व्यक्तव्य में कहा कि आचार्य तुलसी ने अणुव्रत में अणु का नाम लिया है, जब अणु का प्रसार होता है तो वह विशाल रूप ले लेता है और जब उस अणु के साथ व्रत जुड़ जाता है तो मानव जीवन सार्थक हो जाता है।अणुव्रत किसी सम्प्रदाय विशेष का आन्दोलन नहीं है बल्कि सभी संप्रदायों के लिए है। पूज्य प्रवर ने अपने उदबोधन में फ़रमाया कि आचार्य तुलसी ने अणुव्रत का प्रवर्तन किया और अणुव्रत का अर्थ बताते हुए कहा कि अपने से अपना अनुशाषन।अणुव्रत कोई भी ग्रहण कर सकता है। नास्तिक भी इसे स्वीकार कर सकता है। छोटे छोटे संकल्पों द्वारा जीवन का उद्धार हो सकता है। आचार्य तुलसी के जन्म शताब्दी वर्ष को व्यक्तिव विकाश का वर्ष घोषित किया गया है। अणुव्रत ग्रहण करने वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व विकाश हो सकता है। राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में अणुव्रत का योगदान रहा है। राजीव लोंगोवाल समझोते में आचार्य तुलसी का बहुत योगदान रहा।राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए नैतिकता का विकास होना आवश्यक है।भारत का सौभाग्य है कि यह ऋषियों की भूमि रही है। आचार्य तुलसी और महाप्रज्ञ जैसे ऋषि मुनियों ने यहाँ साधना की।देश में भौतिक विकाश के साथ साथ अध्यात्मिक विकाश भी होना चाहिय। अणुव्रत इस दिशा में प्रेरित करता है। अणुव्रत नशामुक्त एवं प्रमाणिक रहने का सन्देश देता है। रिपोर्ट- पवन फुलफगर

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