आचार्य भिक्षु जैसा योग्य गुरु ही अपने शिष्य को विश्व कल्याण की दिशा में आगे बढा सकता है


जैन तेरापंथ न्यूज़ फाइल फोटो 

13/07/2014, नई दिल्ली, । अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में अध्यात्म साधना केन्द्र के वर्धमान सभागार में २५४वां तेरापंथ स्थापना दिवस मनाया गया। खचाखच भरे पण्डाल में जनमेदनी को संबोधित करते हुए आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि तेरापंथ के आद्यप्रवर्तक आचार्य भिक्षु में पौरूष, तेजस्विता, श्रद्धानिष्ठा, संयम साधना, एवं समर्पण का बल था। तेरापंथ की स्थापना उन्होंने की नहीं स्वतः ही हो गई। उनमें ज्ञानावरणीय कर्मों का क्षयोपशम बहुत ज्यादा था इसी वजह से उनके सिद्धांत, उनकी मर्यादाएं आज और भी ज्यादा उपयोगी है। आचार्य भिक्षु जैसा योग्य गुरु ही अपने शिष्य को विश्व कल्याण की दिशा में आगे बढा सकता है। आज गुरु पूर्णिमा के दिन हम अपने गुरु को श्रद्धा, सम्मान समर्पित करते हैं और ऐसी मंगल कामना करते है कि हम अपने पुरखों को आज जैसे याद कर रहे हैं। हम भी इतने महान कार्य करें कि आने वाली पीढयां हमें भी सम्मान से याद करें। आचार्यश्री महाश्रमण ने प्रेरक प्रवचन में कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ एक मर्यादित संगठित है, एक आचार्य की आज्ञा में सब चले यह सिरमौर मर्यादा है। व्यक्ति भले ही अपना शरीर छोड दे किंतु ऐसा संघ, संगठन न छोडें, इससे जुडे रहकर अपना आत्म कल्याण करें, जन-जन का कल्याण करें।  इस अवसर पर मंत्री मुनि सुमेरमल स्वामी, साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा ने तेरापंथ स्थापना दिवस के आयोजन को इतिहास सुरक्षित रखने के लिए व जीवन में नई प्रेरणा घटित होने के लिए आवश्यक बताया। जयश मुनि के गीत से प्रारम्भ इस कार्यक्रम में अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य महाश्रमण प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष कन्हैयालाल जैन पटावरी, जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के कार्यकारी अध्यक्ष गोविन्दराम बाफना ने चातुर्मासिक पावस प्रवासकी पुस्तक व कलेण्डर आचार्यश्री महाश्रमण को भेंट किया।  माणक सिंघी व अरविन्द गोठी ने आचार्य महापप्रज्ञ की अंग्रेजी पुस्तक ’’आचार्य तुलसी थाट एण्ड फिलोसोफी‘‘ आचार्यश्री महाश्रमण को भेंट की। श्री सुखराज सेठिया का सामयिक वक्तव्य हुआ, संघगान के साथ ही कार्यक्रम का समापन हुआ और कुशल संचालन मुनि दिनेशकुमार ने किया।

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