त्याग अपने आप में विसर्जन: आचार्य महाश्रमण


आचार्यश्री महाश्रमण ने महरौली वर्धमान समवसरण में उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि दो प्रकार के धर्म है एक अगार धर्म दूसरा अणगार धर्म। अगार धर्म का गृहस्थ पालन करते हैं। 
आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि अणगार धर्म जिसने घर का त्याग कर दिया, साधु बन गया वह अणगार बन जाता है, अहिंसा अचैर्य, ब्रह्मचर्य को जिसने स्वीकार कर लिया उसके लिए संसार के सारे रिश्ते संबंध विच्छेद हो जाते हैं। श्रावक अपने मन में यह भावना करे कि उसे वह दिन कब प्राप्त हो जिस दिन वह साधु बने, अणगार धर्म को स्वीकार करे। आत्मकल्याण का सघन उपाय है साधुत्व स्वीकार करना। 
आचार्यश्री महाश्रमण ने परिग्रह सीमाकरण की चर्चा करते हुए कहा कि श्रावक को परिग्रह, संग्रह आदि की सीमाकरण करना चाहिए। परिग्रह से मुक्त होने का प्रयास करे, उन्होंने आचार्य तुलसी के विसर्जन सूत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि वह यह सोचे कि मैं अमुक वस्तु, धन का असीमित अधिक मात्रा में संग्रह नहीं करूं ऐसा संकल्प श्रावक के मन में होना चाहिए। 
हमारी आत्मा अनंत काल से परिभ्रमण कर रही है, हमें मावन जीवन मिला है इसे गंवाना नहीं चाहिए, धर्म नौका है, मानव जीवन के प्रति जागरूक रहें इसके द्वारा व्यक्ति संसार सागर से पार पा सकता है। समय बीत रहा है, मृत्यु होना निष्चित है, कब होना अनिश्चित है, मनुष्य के पास चाहे धन कितना ही क्यों न हो उसके प्रति ज्यादा आसक्ति नहीं रखना चाहिए। जब तक शरीर स्वस्थ है तब तक धर्मध्यान करने का चिंतन रहे। 
मंत्री मुनि सुमेरमल स्वामी ने भी अपना वक्तव्य दिया। इस दौरान हर्षा आंचलिया ने बदले जीवन का आधार , बदले मानव का व्यवहार’ गीत की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार ने किया। 

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