हाथ की शोभा दान से : आचार्य महाश्रमण

21 अगस्त, 2014। नई दिल्ली।

आचार्यश्री महाश्रमण ने अध्यात्म साधना केन्द्र के वर्धमान समवसरण में उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि दस प्रकार के श्रमण धर्म में 5वां प्रकार है लाघव अर्थात हल्कापन - शरीर के प्रति ममता व उपकरणों के प्रति साधु आसक्ति कम करे। श्रावक भी अपने शरीर के प्रति मोह एवं आकर्षण को कम करके हलका बने। जो व्यक्ति प्रकृति से विनम्र होता है महान होता है वह बिना ऐशवर्य पैसे के ही अपने आपको विभूषित  कर लेता है।
आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि हाथ की शोभा दान से होती है। दाता अथवा याचक कौन है यह  हाथ की मुद्रा ही बताती है। त्यागी संतो के चरणों में प्रणाम करना सिर का आभुषण है। मुंह का आभुषण है मुंह से सत्य व प्रिय बोलना। कानों का आभुषण है अच्छे आध्यात्मिक गीत सुनना। हृदय का आभुषण है हृदय में दया करुणा, स्वच्छ विचारों का होना है।
आचार्यश्री महाश्रमण जी के नेपाल के कठमाण्डू में अक्षय तृतीया व  विराटनगर में आगामी चातुर्मास की घोषणा की।अग्रिम जानकारी हेतु उनके दर्शनार्थ नेपाल से बड़ी संख्या में पत्रकारों का समूह उपस्थित हुआ।
इस दौरान समणी कुुसुम प्रज्ञा ने ‘व्यक्तित्व निर्माता आचार्य तुलसी’ पुस्तक आचार्यश्री महाश्रमण जी को भेट की तथा अपने विचार व्यक्त किये।
कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने किया।
पर्युषण पर्वाराधना आज से
ज्ञान , दर्शन चरित्र एवं तप की आराधना, मन की ग्रंथियों को खोलने, आध्यात्मिक चेतना के जागरण व आत्म दर्शन का अनूठा व जैन परम्परा का महान पर्व पर्युषण पर्वाराधना का शिविर 22 अगस्त 2014 से प्रारम्भ होगा जो 30 सितम्बर तक चलेगा।  जिसमें अर्हत वंदना, गुरु वंदना, प्रेक्षाध्यान, आगम पाठ, प्रवचन कार्यक्रम, कायोत्सर्ग, सामूहिक जप आदि विशिष्ट कार्यक्रम समायोजित होंगे।

प्रेषक: डाॅ. कुसुम लूणिया 

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