व्यक्ति की साधना प्रबल हो तो देवता भी झुकते है : आचार्य महाश्रमण

23 अगस्त। दिल्ली। परमपूज्य आचार्य श्री ने विशाल जन समूह को तीर्थंकर महावीर की अध्यात्म यात्रा विषय पर प्रतिबोध प्रदान किया।पूज्यप्रवर ने फ़रमाया कि भगवान महावीर की आत्मा ने अनंत अनंत जन्म ग्रहण किये थे। हम सब की आत्मा भी अनंत काल से भव भ्रमण कर रही है।आत्मा का शाश्वत त्रैकालिक अस्तित्व जैन दर्शन में मान्य है।प्रश्न हो सकता है कितनी आत्माएँ हैं?उतर है अनंत आत्माएं हैं।यहाँ तक की जमीकंद में तो सुई टिके उतने भाग में ही असंख्य आत्माएं होती हैं। पूर्ण तथा अनंत जन्मों का विवेचन तो हो नहीं सकता इसलिए भगवान महावीर के 27 भव सम्यक्त्व प्राप्ति के बाद के मुख्य भव हैं।
एक बार भगवान महावीर की आत्मा को मानव जन्म मिला।उनका जन्म जम्बू द्वीप में पश्चिम महाविदेह में महावक्र विजय में जयंती नगरी में हुआ।नाम रखा नयसार।
इसी बीच गुरुदेव ने अढ़ाई द्वीप का वर्णन किया की यहीं मनुष्य रह सकते हैं।जम्बू द्वीप, धातकी खंड ,अर्ध पुष्कर द्वीप।ये ढाई द्वीप हैं।इनमे 15 क्षेत्र हैं 5 भरत क्षेत्र ,5 एरावत क्षेत्र, 5 महाविदेह।प्रत्येक महाविदेह में 32 विजय होती है।और हर महाविदेह में 1 तीर्थंकर युगपत् हो सकते हैं। इस प्रकार महाविदेह में160  तीर्थंकर एक साथ हो सकते हैं। उसी समय भरत और एरावत में भी तीर्थंकर हो तो लोक में एक साथ उत्कृष्ट 170 तीर्थंकर हो सकते हैं ।कम से कम 20 तीर्थंकर तो इस दुनिया में होते ही हैं।
पुनः गुरुदेव नयसार के विवेचन को आगे बढाया कि नयसार अपने साथियों के साथ लकड़ी काटने जंगल गया वहां भोजन करने बैठा और किन्ही संतो को देखा कि रास्ता भूल गए लगते हैं।उन्हें भोजन कराया और मार्ग बताया। साधुओं ने भी नयसार को धर्म मार्ग बताया।धर्म सार सुनकर नयसार को सम्यक्त्व की लब्धि हुई।और वहां से सम्यक्त्व में आयुष्य बंध कर वैमानिक देव बना।
इसी सन्दर्भ में पूज्यप्रवर ने बताया कि सम्यक्त्व में आयुष्य बंध करने वाला वैमानिक देव ही बनता है।जैन मान्यता अनुसार देवता के 4 प्रकार हैं- भवनपति,व्यंतर,ज्योतिषिक ,वैमानिक देव।सम्यक्त्वी हमेशा वैमानिक देव ही बनता है।आदमी देवों की उपासना करता है।पर देवता मनुष्य की पूजा करते हैं।कहा गया -देवा वि तं नमन्सन्ति जस्स धम्मे सयामणो.....आदमी की साधना यदि प्रबल हो तो देवता का मुकुट आदमी के चरणों में झुकता है।
कन्या भ्रूण हत्या पर प्रहार करते हुए आचार्य श्री ने कहा की यह निर्मम और अधम कार्य त्याज्य है।यदि यही चला तो 1 दिन हालत ऐसी होगी कि 5 पांडव 1 द्रोपदी।इस प्रकार पूज्य प्रवर ने सामाजिक कुरुढियों तथा मान्यताओं पर भी प्रहार किया। और जन चेतना को जगाने का प्रयत्न किया।

इससे पूर्व मंत्री मुनि प्रवर ने श्रावकों के गुण तथा सधार्मिक वात्सल्य तथा संघ प्रभावना की बात कही।साध्वी मुकुलयशा तथा सम्बुद्धयशा जी की सुमधुर गीतिका से जनता मन्त्र मुग्ध हो गई। मुनि अक्षय प्रकाश जी तथा मुनि श्री राकेश कुमार जी का प्रभावशाली वक्तव्य जन-चेतना-श्रोत बना। उन्होंने स्वाध्याय की परिभाषा,उद्देश्य,उपयोग,अनेकांत तथा आत्मकर्तृत्ववाद की मान्यताओं को समझाया।
साध्वी शान्तिलता जी ने भगवन ऋषभ पर प्रस्तुति दी।कार्यक्रम का कुशल संचालन दिनेश मुनि ने किया।
भारतीय जनता किसान मोर्चा पंजाब के अध्यक्ष भाई सुखमिंदर पाल सिंग ग्रेवाल जी भी प्रवचन सुनने उपस्थित थे।सम्पूर्ण समाज उल्लसित था।

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