पर्युषण पर्व क्यों? - साध्वीप्रमुखा श्री कनकप्रभा


भारतीय लोक जीवन में पर्वों का बहुत महत्त्व है। इसलिए वर्श भर में अनेकों पर्व भारत में मनाए जाते हैं। भाद्रमास में लौकिक और लोकोत्तर अनेक पर्व मनाये जाते हैं सबका बहुत महत्त्व है किन्तु पर्युषण का सबसे अधिक महत्त्व है। हमारे मध्य कई तरह के प्रतीक पुरुषों की मान्यता है। जिस प्रकार लोक पुरुष, आगम पुरुष, संघ पुरुष की अवधारणा है वैसे ही हम 'वर्ष पुरुष’ को भी मान सकते हैं। वर्ष के आठ महीने ‘वर्ष पुरुष’ के आठ अंग है। चार महीने चातुर्मास के उनके वस्त्र हैं। पर्युषण पर्व उनके आभुषण हैं। इस पुरुष की प्राण चेतना संवत्सर का दिन होता है। इस प्रकार पर्युषण का पर्व हमारे जीवन में बहुत महत्त्व रखता है। बारह महीने में से पर्युषण पर्व प्रतिस्रोत में आगे बढ़ने का पर्व है। इसमे न मनोरंजन है न क्रीड़ा है। यह आत्मरमण, आत्मालोचन एवं आत्मसाक्षात का पर्व है। इसमें हमें आत्मा के साथ रहने का अभ्यास करना है। जिस प्रकार मार्च में व्यापारी वर्ग अपनी आॅडिट रिपोर्ट से अपना विश्लेष्ण करता है वैसे ही पर्युषण पर्व हमें प्रेरणा देता है कि हम आत्मा की आडिट करें कि हमें किसी के साथ शोषण, छल, कपट तो नहीं किया, इस प्रकार हम अपने जीवन की आडिट कर लें तो आगे का पथ प्रशस्त हो जाता है। हमें दूसरों की बजाय अपने आप पर ज्यादा ध्यान देना है। इस वर्ष दिनांक 22 अगस्त 2014 से 30 अगस्त 2014 तक पर्युषण पर्व का आयोजन हो रहा है।
विज्ञान की प्रगति से दुनिया बहुत छोटी होकर एक मोबाइल में समा गई है। लेकिन दुनिया देखने के चक्कर में हम स्व का विस्मरण न करें, आत्मा को विस्मृत न करें। पर्युषण हमें प्रेरणा देता है कि व्यक्ति अपने आपको देखना सोचना शुरू करें। पर्युषण में बहुत साधना आराधना की जाती है। हम विश्लेष्ण करें कि अध्यात्म चेतना, धार्मिक आस्था कितनी बड़ी है? हममें नैतिक चेतना का जागरण कितना हुआ? इसके साथ उपासना पक्ष भी दृढ़ होना चाहिए। धार्मिक व्यक्ति अध्यात्म को समझने का प्रयास करें। अध्यात्म का अर्थ होता है सांसारिक छल प्रपंच से दूर रहकर स्व कल्याण में संलग्न होना।
पर्युषण पंचाचार की साधना का पर्व है। इसका प्रथम आचार है दर्षन विशुद्धि। व्यक्ति की आस्था अपने देव गुरु धर्म के प्रति पुष्ट हो वह दर्शन विषुद्धि है। दूसरा आचार ज्ञानाराधना का है जिसमे अनुसार हमें आगम एवं पवित्र ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए एवं प्रवचन श्रवण में अधिक समय लगाएं। तीसरा है - चारित्रआराधना। इसके अन्तर्गत हमें आत्मालोचन करना है कि हमारा आचरण कैसा है? इसे और अधिक पवित्र कैसे बनाया जा सकता है? चैथा हमें तपस्या के बारह भेदों द्वारा बाह्य व अंतरंग तप से हमारा आभामण्डल उर्जस्वितत करना है। पांचवा है - वीर्याचार। जिस व्यक्ति में जितनी क्षमता है सप्रयास उस क्षमता को पर्युषण पर्व के दौरान बढाने का प्रयास करना चाहिए।

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