शक्ति के द्वारा दूसरो का कल्याण करे : आचार्य श्री महाश्रमण जी

 अणुव्रत चेतना दिवस विशेष 


नई दिल्ली, 26 अगस्त 2014 ध्यात्म साधना केंद्र, महरौली
परम वन्दनीय आचार्य श्री महाश्रमण जी ने भगवान महावीर की यात्रा के प्रसंग के माध्यम से वर्धमान समवसरण में उपस्थित विशाल जनसभा को बताया कि आदमी के शक्तिशाली होने का अर्थ है उसके सौभाग्य का योग साथ में होना। शरीर की शक्ति के द्वारा दूसरो का कल्याण करना चाहिए। हमारे मन में अपने स्वास्थ्य कि अनुकूलता के अनुरूप दूसरो की सेवा का अहोभाव होना चाहिए। धर्मसंघ मे सेवा की व्यवस्था हेतू सेवाकेंद्र बने हुए है। सौभाग्य से हमारे धर्मसंघ के साधू साध्वियो में सेवा के अच्छे संस्कार है। धन्य है वो साधू साध्वियाँ जो रुग्णों की सेवा करते है, सेवा केन्द्रों में अपनी सेवाए देते है। आचार्य की सेवा करना भी बहुत बड़ी सेवा है। नवदीक्षित साधू साध्वियो को प्रशिक्षण देना, संस्कार देना एवं बाल पीढ़ी का निर्माण करना भी सेवा का काम है। सेवा करते समय प्रतिफल कि आकांक्षा नहीं करनी चाहिए। हमारे जीवन में समस्याए भी आती रहती है। जहाँ जीवन है वहां कठिन परिस्थितियों का आना स्वाभाविक है। परन्तु समस्या का ऊपर ऊपर से समाधान न करके मूल से समाधान करना ख़ास बात है  इसके उपरान्त पूज्यप्रवर ने आज के समय की महत्वपूर्ण मांग समय प्रबंधन विषय का महत्व बताते हुए फ़रमाया कि हर आदमी की दिनचर्या व्यवस्थित होनी चाहिए  बाल मुनियों को इंगित करते हुए फ़रमाया कि बाल साधू साध्वियो को स्वाध्याय, ध्यान, जप में समय का सदुपयोग करना चाहिए ताकि बाद में अनुताप न करना पड़े- "ते हि मे दिवसा गताः" अर्थात फिर यह न सोचना पड़े कि वे दिन तो चले गए।इस प्रकार समय का सही अंकन होना चाहिए। पर्युषण पर्व के पंचम दिन "अणुव्रत चेतना दिवस" के सन्दर्भ में पूज्यप्रवर ने फ़रमाया कि साधू साध्वी के लिए महाव्रत है, तथा गृहस्थो के लिए अणुव्रत है। हर जाति, वर्ग ,संप्रदाय का व्यक्ति अणुव्रती बन सकता है।यहाँ तक कि नास्तिक भी बन सकता है।हमारा प्रयास रहे कि हम अणुव्रत का यथावत प्रचार प्रसार भी करे। मुनि अनेकांत जी द्वारा अणुव्रत चेतना दिवस पर आधारित मधुर गीतिका का संगान किया गया।साध्वी श्री रचना श्री जी ने अपने वक्तव्य के माध्यम से बताया कि अणुव्रत छोटे-2 नियमों कि श्रृंखला हैं। नैतिक चेतना को जगाने का उपक्रम है अणुव्रत। अणुव्रत की उतनी ही आवश्यकता है जितनी रोटी कपडा ओर मकान की।संयम की प्रेरणा देने वाला यह दिवस श्रावक समाज को आह्वान करता है कि अणुव्रत को अपने जीवन में अपनाये एवं जीवन के मूल्यों को बढ़ाये। शासन श्री मुनि सुखलाल जी ने कहा अणुव्रत शब्द भगवान महावीर की देन है।उन्होंने अपने वक्तव्य के माध्यम से सन 1950 में आचार्य तुलसी के सानिध्य में आयोजित हुए प्रथम अणुव्रत अधिवेशन के संस्मरणों का पुनरावर्तन किया। उस अधिवेशन में पहली बार चांदनी चौक मे 400 लोगो ने मिलावट न करने की शपथ ली थी।मुनि श्री ने यह भी बताया कि UNO में अणुव्रत के कार्यकर्ताओ को निमंत्रित किया जा रहा है। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया। विशाल जन समूह ने धार्मिक श्रवण का लाभ उठाया।


संवाद एवं फोटो साभार : दिव्या जैन, विनित मालू, जैन तेरापंथ न्यूज़ टीम दिल्ली दिनांक : २६-०८-२०१४

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