देश की राजधानी दिल्ली में जैन एकता का अनुपम अवसर : 80 जैन साधु-साध्वियों के मध्य लगी धर्म संसद


In pious Presence of Pujya Aachary Shri Mahashraman ji, Aachary Shri Shiv Muni Ji, Aachary Shri Abhayadev Suriswar Ji, Muni Shri Tarunsagar Ji at Dharm Sansad held at Delhi. 


दिल्ली में धर्म संसद में उपस्थित जैनाचार्य एवं मुनि वृन्द. 

जेतेस ब्योरों न्यू दिल्ली, 14 सितम्बर, रविवार को दिल्ली में क्रांतिकारी राष्ट्रसंत मुनि श्री तरुणसागरजी की प्रेरणा से धर्म संसद का आयोजन किया गया, इसमें जैन परंपरा के चारो संप्रदाय के प्रमुख संतो के अलावा 80 जैन साधु-साध्वियां उपस्थित थी । दिगंबर जैन सम्प्रदाय के राष्ट्रसंत मुनिश्री तरुणसागर जी, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ सम्प्रदाय के आचार्य महाश्रमण जी, स्थानकवासी संप्रदाय के आचार्य शिवमुनि जी,मूर्तिपूजक संप्रदाय के आचार्य अभयदेवसूरी जी आदि संत मोजूद थे । समारोह में  पर्युषण पर्व के बाद आने वाले पहले रविवार को हर वर्ष "राष्ट्रीय क्षमवाणी दिवस" के रूप में मानाने का प्रस्ताव पारित किया । तरूणसागर जी ने कहा की अगर हम दिगंबर - श्वेताम्बर जेसे विशेषणों को 5 साल के लिए कचरे के डिब्बे में डालकर सिर्फ जैन होने का विशलेषण करें तो जैन धर्म के डंके की अनुगूंज दुनिया में सुनाई देने लगे। और धर्म संसद में मुनि श्री तरुण सागर जी ने आचार्य श्री महाश्रमण जी से कहा -
भगवान महावीर स्वामी ने दीक्षित शिष्यों के लिए श्रमण शब्द का इस्तेमाल किया था । हम सब तो सिर्फ श्रमण है पर आप महाश्रमण हो !!!
आचार्य महाश्रमण जी ने कहा की जैन परंपरा के सभी संतो का एक मंच पर आना ही जैन एकता का संदेश हैं
आर्हत वाड्मय में कहा गया है- णमो जिनाणं जियभयाणं। अर्थात मैं उन वीतराग प्रभु को नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने भय को जीत लिया। जब समता का विकास हो जाता है फिर भय नहीं रहता। राग द्वेष भी दूर हो जाते हैं।

इसके उपरांत गुरुदेव ने इस कार्यक्रम को लक्षित करते हुए फ़रमाया कि जिन द्वारा प्रवर्तित है यह जैन शासन। आज हमारे चारो सम्प्रदायों का संगम हो रहा है। यह एक बड़ी बात है। जैन शासन में क्षमा का बहुत महत्व है। क्षमा के आधार पर ही विश्व मैत्री की कल्पना की जा सकती है। हमारा पर्युषण और दिगम्बर परम्परा का दशलक्षण पर्व समाप्त हुआ है। दोनों जैन धर्म के विशिष्ट पर्व हैं। इन दोनों पर्वों के समाप्त होने पर पहला रविवार विश्व मैत्री दिवस के रूप में मनाया जाए। इस आधार पर हम एकता की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। जैन शासन की एकता इस आधार पर हो कि परस्पर मैत्री भाव रहे। हम जैन विद्या के विकास एवं प्रचार प्रसार का प्रयास करें। उसकी सुरक्षा का भी प्रयास करें। यह सम्भव नहीं कि हम सभी जैन सम्प्रदाय वेश, चर्या आदि में एक हो जाएं, पर हम आपस में मैत्री भाव व सद्भावना रखें। जैन शासन की सुरक्षा व विकास का भी प्रयत्न रहे। गुरुदेव ने कहा कि वेश से मुक्ति नही मिलेगी, राग-द्वेष मुक्ति से ही मुक्ति मिलेगी। क्षमा के द्वारा अपने चित्त को प्रसन्न व निर्मल बनाने का प्रयास करें। भारत जैसे देश से तो अध्यात्म की बात बाहर जाए। अध्यात्म का प्रसार हो। हम सभी अपने भीतर क्षमा एवं समता का विकास करते है।

आचार्य शिवमुनि जी ने कहा की तरुणसागर जी के ओजस्वी प्रवचनों ने देश में नयी क्रांति पैदा की हैं। आचार्य अभयदेवसूरी जी ने कहा कि क्षमापना जैन धर्म की पहचान हैं।


आचर्य श्री महाश्रमण जी एवं कडवे प्रवचनकार मुनि श्री तरुण सागर जी म.सा.

दिल्ली में धर्म संसद में उपस्थित जैनाचार्य एवं मुनि वृन्द.

प्रस्तुति : करुणा कोठारी,  महावीर कोठारी, मान्या कुंडलिया, विनय जैन, रिषभ जैन , विनीत मालू, दिव्या जैन, जैन तेरापंथ न्यूज़ टीम दिल्ली. 

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