धार्मिक कार्यों में हो समय का नियोजन

नई दिल्ली, 24 सितम्बर 2014

तेरापंथ के महासूर्य, महातपस्वी महाश्रमण जी ने जनता को संबोध प्रदान करते हुए फ़रमाया- आर्हत वाड्मय में कहा गया कि जो रात्रि बीत जाती है, वह वापस नहीं आती। धर्म करने वाले की रात्रियाँ सफल हो जाती हैं। हमारे जीवन में समय का महत्त्व है। और समय थोड़ा नही है। अनंत है। और समय का गुण होता है बीतना। जैन पारिभाषिक शब्दों में जो समय है। वह समय तो इतना सूक्ष्म है कि एक सेकंड में असंख्य समय बीत जाते हैं। पंडित आदमी समय को पहचाने और उसे सार्थक करने की कोशिश करें। हम समय का सदुपयोग करने की कोशिश करें। जो समय बीत गया उसकी कितनी भी प्रतीक्षा कर लो लौटने वाला नहीं।
जो आदमी अच्छे कार्यों में समय को नियोजित करता है, वह आदमी अच्छा होता है। संस्कृत साहित्य में कहा गया जो व्यक्ति बुद्धिमान होते हैं, उनका समय ज्ञान की चर्चा में बीतता है। अज्ञानी, प्रमादी का व्यसनों, लड़ाई-झगड़े या आलस्य में जाता है। परम पूज्य गुरुदेव ने काल व मृत्यु को बहुत निष्पक्ष व समवर्ती बताया। तथा कहा कि हर व्यक्ति को दिन में 24 घंटे मिलते हैं। हर घंटे से 2-2 मिनट निकालें तो एक सामायिक का कालमान यानि 48 मिनट हो जाता है। हम धार्मिक कार्यों में समय लगायें। धर्म को प्राथमिकता दे कर समय प्रबंधन करें।
पूज्यवर ने कहा धार्मिक उपासना के लिए समय न मिले तो आचरण तो शुद्ध रखें। आचरण शुद्धि का मतलब आप में नैतिकता कितनी है? व्यवहार कैसा है? उपासना के लिए तो समय की जरुरत होती है, पर आचरण युक्त धर्म हर कार्य के साथ जुड़ सकता है। आचरण की कमजोरी के लिए उपासना धर्म की अवमानना नहीं करनी चाहिए। वृत्ति का परिष्कार करना चाहिए। कमियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। जीवन का यह लक्ष्य रहे समय का बढ़िया उपयोग करें। बढ़िया उपयोग से इस भाव में भी अच्छा और आगे भी अच्छा हो सकेगा। समय का अंकन करें और समय का सदुपयोग करने का प्रयास करें।


"उपासना व आचरण से ही मुक्ति संभव"- मंत्री मुनि प्रवर
मंत्री मुनि प्रवर ने कहा- सत्य ही भगवान है। जो व्यक्ति धार्मिक बनता है, वह उपसनाशील व आचरणशील बनता है। उपासना का अपना महत्त्व है पर आचरण का महत्त्व अधिक है। कोरी उपासना कई बार मखौल का कारण बन जाती है।धर्म को आचरण में लाने से ही बात बनेगी। हर धार्मिक व्यक्ति को यह सोचना है कि मेरे दोनों पक्ष सही हैं या नहीं। अपने आप का साक्षी व्यक्ति स्वयं ही हो सकता है। यदि कमजोरी है तो उसे छुपायें नहीं उसे दूर करने का प्रयास करें। कमजोरी को यदि ढक कर रखा जाये तो घाव की तरह नासूर बन जाती है।छुपायें नहीं परिष्कार की कोशिश करें।आपके उपासना और आचरण दोनों पक्ष मजबूत होंगे तभी मुक्ति संभव है।


प्रस्तुति : जेतस से करुणा कोठारी विनित मालू

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