धर्म को जीना सीखे: आचार्य श्री महाश्रमण

नई दिल्ली, 12 अक्टूबर 2014

आज वर्धमान समवसरण में नव दीक्षार्थियों को बड़ी दीक्षा (छेदोपस्थापनीय चारित्र प्रत्याख्यान) का कार्यक्रम हुआ। सभी नव दीक्षार्थियों को पूज्यप्रवर के द्वारा बड़ी दीक्षा प्रदान की गई इस अवसर पर नव दीक्षित मुनि पावन कुमार ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा - दीक्षा के बाद इन सात दिनों में गुरुदेव का सानिध्य पा सात्विक आनंद प्राप्त कर रहा हूँ। गुरुदेव की सन्निधि में तीर्थंकर की सन्निधि जैसा आभास होता है। गुरुदेव के दर्शन करने जाता हूँ तो गुरुदेव पूछते हैं कि-"कियां! सुखसाता है? मन लाग ग्यो के?" तथा बहुत ख्याल रखते हैं। सभी साधू बहुत ख्याल रखते हैं। सभी नव दीक्षित साध्वियों ने "भैक्षव शासन री आ बगिया लागे घणी सुहावणी" इस गीत के माध्यम से अपनी बात को सामूहिक प्रस्तुति दी।

मंत्री मुनि प्रवर ने समुपस्थित धर्म श्रोताओं को संबोधित करते हुए फ़रमाया कि शास्त्रकारों ने कहा है कि धर्म हमारे जीवन में दीप है, आधार है प्रतिस्थान है। धर्म के माध्यम से हम अपने भटकाव , उलझन को समाप्त कर जीवन को निर्द्वन्द्व कर सकते हैं। बशर्ते धर्म को व्यक्ति स्वयं का जीवन बना ले। केवल धर्म की छाप लगाने से कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होनी।

तो यह बड़ी बात है कि व्यक्ति धर्म को जीना शुरू करे। 24 घंटे वैसा जीवन जीना, धर्म को व्यवहार, आचरण में उतरना ही धर्म को जीना है। कषाय मंदी से कलह और वासना मिटेंगे और मोक्ष का मार्ग खुलेगा। जो वर्तमान में शांति से जीता है, वह आगे भी शांति को प्राप्त करता है। इसलिए वर्तमान को सहज, शांत बनाओ ताकि आगे का क्रम तुम्हारा ठीक बन सके।

मुनि श्री ने पारिवारिक एकता के सन्दर्भ में एक मार्मिक कथानक सुना कर जनता को भाव विभोर कर दिया। सारांश रूप में मुनि श्री ने फ़रमाया कि परिवार में सामंजस्य व परस्पर सहयोग की भावना हो तो वह परिवार की उन्नति में आलंबन बनती है। तो परिवार में एकता बनी रहे, यही काम्य है। मुनि विजय कुमार जी ने गीत के माध्यम से अपनी भावना व्यक्त की। मंच का कुशल सञ्चालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।

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