संसार के दो भ्रम- कांता और कांचन - आचार्य श्री महाश्रमण जी

दिगम्बर जैन मंदिर, मथुरा 29.11.2014 ज्योतिपुंज महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपनी अहिंसा यात्रा के दौरान अपने प्रात: कालिन प्रवचन में फरमाया की हमारी दुनिया में त्याग भी चलता है और भोग भी चलता है। त्यागी लोग भी मिलते है, भोगी लोग तो संसार में रहते ही है। प्रश्न होता है की त्यागी कौन कहला सकता है। शास्त्र में कहा गया है की भोग न भोगने से कोई त्यागी नहीं हो जाता है। एक आदमी के पास वस्त्र ही नहीं वह कपडा न पहने तो कोई त्याग वाली बात नहीं। सुगंध है ही नहीं, गंध का सेवन ना करे कोई त्याग वाली बात नहीं, आभुषण पास में है ही नहीं और आभुषण न पहने कोई त्याग वाली बात नहीं, स्त्री है ही नहीं स्त्री असेवन की बात करे वह त्याग वाली बात नहीं। यानि परवशता में जो उपयोग नहीं करता भोग नहीं करता वह त्यागी नहीं होता है।
कान्त और प्रिय भोग सहज सुन्दर अथवा जो प्रिय लगने वाले हो प्राप्त है, पास में उपलब्ध है फिर भी जो उससे पीठ फेर लेता है उसको छोड़ देता है साधना के लिए  स्वाधिनता पूर्वक जो भोगों का त्याग करता है वह आदमी फिर त्यागी कहलाने का अधिकारी होता है।
आदमी आत्महित के बारे में सोचे वह वर्तमान जीवन पर भी ध्यान दे की मेरा वर्तमान जीवन कैसा है और यदा कदा यह भी सोचे की मेरी अगली गति कैसी होगी,  मुझे कहा जाना है।

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