संयममय हो जीवन : आचार्य श्री महाश्रमणजी

महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय औरंगाबाद में उपस्थित जनसभा को संबोधित करते हुए फ़रमाया कि- दुनिया में दो तत्व है-जीव और अजीव. इन दो के सिवाय हमारी दुनिया में कुछ भी नहीं. हमारा जीवन भी जीव और अजीव का योग है. शरीर जड़ है, अजीव है तो आत्मा चेतन है, जीव है। शरीर और आत्मा के योग से ही जीवन है। सिद्ध परमात्मा में आत्मा है, चेतन है किन्तु शरीर नहीं इसलिए उस अवस्था में जीवन भी नहीं होता।जो जीव और अजीव को जान लेता है वही संयम को जान सकता है, एवं जीवन को संयममय बना सकता है।
स्कूल के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए पूज्यप्रवर ने फ़रमाया कि-अभिभावक तीन उद्देश्यों से अपने बच्चों को स्कुल भेजते है- 
1) विद्या संस्थान में बच्चा ज्ञान सम्पन्न बने।
2) संस्थान में रहते हुए वह आत्मनिर्भर बने एवं कमाई के लायक बन जाए।
3) बच्चा सुसंस्कार सम्पन्न बने।
यदि इन तीन उद्देश्यों की पूर्ति में कही कमी रह जाए तो शिक्षा संस्थान सफल नहीं कहे जा सकते। चाहे वह शिक्षा प्रणाली की कमी हो, शिक्षकों की कमी हो या शिक्षा ग्रहण करने वालो की ओर से कमी हो। विद्यालयों में ज्ञान के साथ सुसंस्कार मिलने चाहिए। ज्ञान पवित्र चीज है एवं उसे बढाने का प्रयास होना चाहिए। लौकिक विद्याएं जैसे कि गणित, भूगोल आदि के साथ साथ विद्यार्थियों को अध्यात्म के बारे में भी बताया जाना चाहिए।
पूज्यप्रवर ने विद्यार्थियों को अहिंसा यात्रा के लक्ष्यों के बारे में समझाते हुए उन्हें दुसरे सम्प्रदायों के प्रति सद् भावना रखने, नशामुक्त जीवन जीने, सह-अस्तित्व एवं समन्वय के सूत्र अपनाने की प्रेरणा दी। विद्यार्थियों ने पूज्य्प्रवर के समक्ष नशा न करने के संकल्प ग्रहण किए।
इससे पूर्व औरंगाबाद के सरपंच श्री हरदेवसिंह चौहान ने आचार्य श्री महाश्रमणजी एवं अहिंसा यात्रा का पुरे गाँव की ओर से स्वागत अभिनन्दन किया। उन्होंने अहिंसा यात्रा हेतु मंगलकामना भी की। कार्यक्रम का संचालन मुनि श्री दिनेशकुमारजी ने किया. 

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