सुखी परिवार हेतु संप आवश्यक : आचार्य महाश्रमण जी

अहिंसा यात्रा के दौरान स्पेक्ट्रम इंटरनेशनल स्कूल होडल में उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए शांतिदूत राष्ट्र संत आचार्य श्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि व्यक्ति सामूहिक जीवन जीता है,कुछ व्यक्ति एकांकी जीवन भी जीते, साधना के क्षेत्र में भी वैयक्तयिक एवं संघबद्ध साधना की बात आती है| जहा वैयक्तिक साधना में व्यक्ति अकेला साधना करता है वही संघबद्ध  साधना  में व्यक्ति समूह में रहकर साधना करता है|
गृहस्थ जीवन में प्राय: लोग पारिवारिक जीवन जीते है. परिवार से मिलकर समाज बनता है। जिस  परिवार में संप, सन्मति एवं संपत्ति हो वह स्वर्ग तुल्य सुखी बन सकता है। वही इनके अभाव में परिवार नर्क तुल्य दुखी परिवार बन कर रह जाता है। जिस परिवार में सामूहिक चिन्तन है,संप है,  नशामुक्ति, ईमानदारी जैसे संस्कार है, सन्मति है एवं जीवन की अपेक्षाओं की पूर्ति हेतु आवश्यक सम्पत्ति भी है, वह सुखी परिवार है.।वही जिस परिवार में संप के स्थान पर आपसी कलह,  सन्मति के स्थान पर स्वार्थ और वैमनस्य जैसी कुमति है, एवं सम्पति के अभाव में विपत्ति है तो वह परिवार दुखी परिवार बन जाता है।
परिवार में एक दुसरे के प्रति सहिष्णुता हो, एक दुसरे को सहन करे, एक दुसरे के विचारों पर ध्यान दिया जाए यह पारिवारिक संप के लिए अपेक्षित है। परिवार के  दुसरे सदस्यों के हित चिन्तन हेतु स्वयं के स्वार्थ का त्याग करे। मुखिया कहलाने का अधिकारी भी वही बन सकता है जो दूसरों का हित चिंतन करे। दूसरों पर शासन करने से पहले स्वयं अनुशासित होना जरुरी है- निज पर शासन, फिर अनुशासन.   सेवा और सत्कार भी संप बढाने वाले होते है।  परिवार में सुसंस्कार आए, शुद्ध खानपान रहे यह सन्मति के लिए अपेक्षित है।परिवार बहुत अमीर न हो परन्तु जीवन की अपेक्षाओं की पूर्ति हो सके इतनी संपत्ति हो। भूख या अभाव के कारण आदमी आपराधिक प्रवृत्तियों की ओर भी मुड सकता है।

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