पराया धन धूल समान : आचार्य श्री महाश्रमण जी

26 दिसम्बर, ग्वालियर. आचार्य श्री महाश्रमण जी अहिंसा यात्रा के साथ शुक्रवार को जैन छात्रावास से मुरार एन्क्लेव पहुंचे। आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपने प्रवचन में फरमाया- पराए धन पर कभी भी नजर नहीं गडानी चाहिए क्योंकि ऐसा धन धूल के समान होता है। जिस तरह से धूल को कोई नहीं उठाता है उसी तरह से किसी दूसरे का धन या कोई वस्तु भी चोरी मानी जाती है। चोरी नहीं करने वाला व्यक्ति से विपत्ति दूर भाग जाती है। जैसे सूर्य के आने से अंधकार भाग जाता है। जैन धर्म में 18 पाप बताए गए है।

आचार्य श्री ने फरमाया की जीवन में किये गए हर पाप का हिसाब मनुष्य को देना होता है। इस बात का पता किसी को नहीं होता है। मनुष्य का जीवन सीमित है। इस जीवन का मोल समझना चाहिए। क्योंकि वही मोक्ष का माध्यम है। संसार में इस बात को सब समझते है लेकिन उस पर विचार कोई नहीं करता है। इसलिए वह जीव अलग-अलग योनियों में भ्रमण करता रहता है।

संस्कारों की सम्पदा अमूल्य होती है। माता-पिता का कर्त्तव्य है कि वह अपने बच्चों में संस्कार रूपी बीज रोपित करें सदाचार के मार्ग पर चले। उसे अत्याचार, दुराचार, भष्टाचार जैसे बुरे काम से बचना चाहिए। संचालन मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने किया।

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