बौद्धिक विकास के साथ भावनात्मक विकास जरूरी : आचार्य महाश्रमण

3 फ़रवरी । फतेहपुर । परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमण ने अपने प्ररेणादायी पाथेय में फरमाया कि अध्ययन के चार उदेश्य है- श्रुत प्राप्ति करना, एकाग्रचित्त बनना, स्वयं सन्मार्ग में स्थित होना और दूसरों को भी सन्मार्ग में स्थित करना । उन्होंने कहा कि जीवन में शिक्षा का बडा महत्व है । शिक्षा से अज्ञान रूपी अंधकार दूर होता है । अज्ञान दु:ख है,कष्ट है । अज्ञान से आवृत्त चेतना वाला व्यक्ति अपने हित अहित का बोध नहीं कर पाता है इसलिए ज्ञान का आसेवन करना चाहिए । विद्या से आदमी अमरत्व को प्राप्त हो जाता है । विद्या विमुक्ति दिलाने वाली होती है । मोक्ष के लिए विद्या व ज्ञान की आवश्यकता है।

शिक्षण संस्थानो में ज्ञान प्रदान तो होना चाहिए साथ में अच्छे संस्कार भी प्रदान होने चाहिए । वे शिक्षण संस्थान सफल व सुफल है जहाँ छात्रों को ज्ञान और संस्कार दोनों दिए जाते है ।बुद्धि विकास के साथ भावनात्मक विकास भी होना चाहिए । शिक्षक छात्रों को शिक्षा के साथ संस्कार भी दे । विद्यार्थी पीढी अच्छी है तो देश का भविष्य भी उजला हो सकता है।

आज पूज्यप्रवर का प्रवास फतेहपुर के सरस्वती विद्या मंदिर इन्टर कालेज में हुआ । यहाँ 178 का स्टाफ है व लगभग 4000 बच्चे अध्ययन करते है । पूज्यप्रवर ने फरमाया कि यहाँ हजारों विद्यार्थी पढते है तो यहाँ संस्कार की बात भी चलती होगी । यह एक विशाल विद्या संस्थान है। पूज्यप्रवर के स्वागत में प्रधानाचार्य श्री नरेंद्र मिश्रा ने कहा कि आप यहाँ पधारे यह पुरे विद्या संस्थान का सौभाग्य है । हमने आपसे प्ररेणा प्राप्त की ओर आपकी सीख पर खरा उतरने का प्रयास करेंगे ।

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