आत्मरक्षण के लिए करें इन्द्रिय संयम: आचार्य श्री महाश्रमण


परमपूज्य आचार्य महाश्रमणजी ने आत्मरक्षा करने की प्रेरणा देते हुए फरमाया कि व्यक्ति को अपनी आत्मा की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि अरक्षित आत्मा जन्म-मरण की परंपरा में भ्रमण करती है। सुरक्षित आत्मा सब दुखों से मुक्त हो जाती है । रक्षा करने के लिए सभी इन्द्रियों का संयम कर लेना चाहिए । आत्मा की रक्षा करने के लिए शरीर को छोड़ दे पर धर्म न छोड़े, आत्मरक्षा न छोड़े । 

आत्मा शाश्वत है शरीर अशाश्वत है । आत्मा द्रव्य है, शरीर एक पर्याय है। बाह्य भाव संयोग लक्षण वाले है । जिसका संयोग होता है वह वियोग में भी बदल जाता है संयोग अस्थायी होता है । शरीर भी आत्मा से अलग हो सकती है । सुक्ष्म शरीर से आत्मा का अलग होना मोक्ष है और स्थूल शरीर से आत्मा का मुक्त होना मृत्यु है । 
हमारे राग द्वेष जितने कम होंगे उतने हम मोक्ष के निकट हो जाएंगे । राग द्वेष की तरंगो से मन तरंगित नहीं होता है तो आत्मत्व का दर्शन हो सकता है । 

अध्यात्म की साधना में आत्म साधना, मोक्ष, अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त आनंद, अनन्त शक्ति की बात होती है । हम अपने जीवन में आत्म उत्थान करने के लिए अध्यात्म की साधना करने का प्रयास करें । इन्द्रिय विजय, मनो विजय, वाक् विजय,शरीर अनुशासन की साधना करें ।ऐसा होने पर आत्म विजय की साधना हो सकती है । अनंत अनंत जन्मों से हमारी चेतना में राग द्वेष के संस्कार जुड़े हुए है । इन संस्कारो को खत्म करने के लिए राग-मुक्ति का अभ्यास जरुरी है । 

परमपूज्य आचार्यप्रवर का आज तिलयाणी बोलिन्दा के प्राथमिक विद्यालय में प्रवास हुआ । 

संवाद: राजू हीरावत, टाइपसेटिंग: अलका मेहता, प्रस्तुति: जैन तेरापंथ न्यूज़, 04.02.15

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