राग द्वेष मुक्त होकर बने सुखी: आचार्य श्री महाश्रमण

चेतगंज, 20 फर.(JTN) परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमणजी ने फ़रमाया कि- हमारी पांच इंद्रिया ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कामेन्द्रिया कहलाती है । श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रसन और स्पर्शन ये पांच ज्ञान का माध्यम है, इसलिए ज्ञानेन्द्रियाँ है । इन पांच इन्द्रियों को कामी और भोगी इन दो भागों में विभक्त है । श्रोत से शब्द सुना जाता है, आँख से दूरस्थ रूप को देखा जाता है, नाक से गंध भीतर आती है, जिव्हा से स्वाद आता है एवं शरीर से छुआ जाता है। घ्राण, रसन, स्पर्शन भोगी इन्द्रियाँ है । श्रोत व चक्षु से सीधा भोग नहीं होता है जैसा बाकी तीनों इन्द्रियों से होता है, इसलिए श्रोत व चक्षु कामी इन्द्रियां है । पूज्यप्रवर ने आगे फ़रमाया कि- आदमी गलत को छोड़ने का प्रयास करें, राग-द्वेष को छोड़ने का प्रयास करें । मोह राग को छोड़ने वाला व्यक्ति सुखी हो जाता है । 

पूज्यप्रवर ने आचार्य कालूगणी के जन्मदिवस के उपलक्ष में श्रद्धाभावना अभिव्यक्त करते हुए फरमाया कि आचार्य कालूगणी हमारे धर्मसंघ के महान आचार्य थे । गुरुदेव तुलसी एवं आचार्य महाप्रज्ञजी के वे गुरु थे । मैंने भी दीक्षा के समय उनके नाम का जप किया था । कालूगणी ने बचपन में ही संन्यास स्वीकार कर लिया था । अविवाहित बाल्यावस्था में दीक्षा लेकर पूरी जिंदगी ब्रह्मचर्य पालन करना एक विशेष उप्लब्धि है । कालूगणी ने साधना की और विद्वता अर्जित की । संघ में संस्कृत भाषा का विकास उनके युग में हुआ ।
आज फाल्गुन शुक्ला द्वितीया है । आज ही के दिन अणुव्रत आंदोलन, पारमार्थिक शिक्षण संस्थान एवं आदर्श साहित्य संघ का प्रादुर्भाव हुआ था । 

पूज्यप्रवर का आज चेतगंज के काशीनाथ एंड सन्स में प्रवास हुआ । प्रतिष्ठान के मालिक श्री रमाशंकर त्रिपाठी एवं श्री रविंद्रकुमार त्रिपाठी ने पूज्यप्रवर के स्वागत में अपने भावों की अभिव्यक्ति दी एवं परिवार की कन्याओं द्वारा पूज्यप्रवर की अभिवन्दना में गीतिका का संगान किया ।

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