पहले व्यक्ति भोग भोगता है, फिर भोग व्यक्ति को भोगने लगता है : आचार्य श्री महाश्रमण


दिनांक 06/03/15, गाजीपुर, उत्तरप्रदेश (ABTYP JTN) एक दिवसीय प्रवास हेतु,आज पूज्य गुरूदेव आचार्य श्री महाश्रमण जी का गाजीपुर के ऐ.पी.एस पब्लिक स्कूल के विशाल प्रांगण मे पदार्पण हुआ। उपस्थित जनों को उदबोधन देते हुऐ, पूज्यप्रवर ने फरमाया -"वीतराग आत्माएं कामना और लोभ रहित होती हैं किन्तु सामान्य आत्मा में इच्छा, लालसा और लोभ की वृति न्यूनाधिक रहती है।आकाश अनंत है। उसका कोई छोर नहीं है किन्तु इच्छाएं आकाश से भी बड़ी हो जाती हैं। सभी प्रकार के, सभी आयु के व्यक्तियों मे इच्छाएं होती हैं। कवि ने कहा है कि - शरीर गल गया ,सिर सफेद हो गया, मुख दन्तविहीन हो गया, वृद्धावस्था हो गई, लाठी के सहारे चलना पडता है, किन्तु लालसाएं पीछा नहीं छोडती हैं।

साधु-सन्यासी भी लालसा मुक्त नही हैं। गर्मी मे पंचाग्नि तप और भयानक शीत में निर्वस्त्र रह कर कठोर साधना करने वालों को भी आशा (कामना) का जाल जकड़े रहता है। इसी लालसा के कारण, हम बार-बार जन्म मरण को प्राप्त कर रहे हैं। गर्भावस्था के दुखों को सहन कर रहे हैं, किन्तु तृष्णा, लालसा, असंतोष से मुक्त होना संभव नहीं हो पाता। पहले व्यक्ति भोग भोगता है, फिर भोग व्यक्ति को भोगने लगता है। तृष्णा बूढ़ी नहीं होती , हम ही बूढ़े हो जाते हैं। पाप का बाप है लोभ। लोभ ही दुखों का मुख्य कारण है, अत: लोभ, तृष्णा, आकांक्षा पर नियन्त्रण होना चाहिए।


पूज्यप्रवर ने इच्छा संयम के सन्दर्भ में कहा- हम अनिच्छ नहीं बन सकते तो महेच्छ भी न बनें, अल्पेच्छ बन कर रहें। सन्तोष परम सुख है। ज्ञानी और पंडित व्यक्ति संतोष धारण कर रखते हैं। किन्तु असन्तोषी सदा मूढता में जीते हैं। तीन बातों मे संतोष अवश्य रखना चाहिए -स्वदार, भोजन और धन। तीन बातों में संतोष धारण नहीं करना चाहिए - अध्ययन (ज्ञान प्राप्ति), जाप, दान। अत: सन्तोष की साधना आवश्यक है।
साध्वी चारित्रयशा जी और मुनि राज कुमार जी ने सुमधुर गीतों का संगान किया। बालोतरा से समागत तेयुप के सदस्यों ने होली की राग पर 'दर्शन पाए रे' इस गीत का संगान किया। भाई दिलीप जी पचपदरा ने भी गीत गायन किया।


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