मनुष्य संघर्ष की आंच में तपकर मनुष्य बनता :मुनिश्रीविनयकुमार जी आलोक

चंडीगढ,21 मार्च, संघर्षमय जीवन अपने में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जैसे आंच में तप कर सोना कुंदन बनता है वैसे मनुष्य भी संघर्ष की आंच में तपकर मनुष्य बनता है। उसमें जीवनोपयोगी गुणों का विकास होता है, जो उसे परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाते हैं। ऐसा व्यक्ति निर्भीक, स्पष्टवादी और विचारक होता है और बाद के जीवन में दुखों को बड़ी आसानी से बर्दाश्त कर लेता है। संघर्ष चाहे स्वयं के लिए किया गया हो या दूसरों के उत्थान के लिए, यह अंतत: हमारे स्वास्थ्य और संवृद्धि में सहायक होता है। संघर्ष के बाद सफलता मिलती है, जो हमें खुशी प्रदान करती है। चुनौती को स्वीकार किए बगैर जीतना असंभव है। इसलिए संघर्ष दुख नहीं, दुख से बाहर आने का प्रयास है, यानी सुख और आनंद पाने का प्रयास है। तो क्यों न संघर्ष को आनंद का उद्गम कहा जाए।  ये शब्द मनीषी संत मुनिश्रीविनयकुमारजी आलोक ने कहे।

मनीषी श्री संत ने कहा- आज संसार प्राय- सुख के लिए दिन रात भागदौड किए हुए है। लेकिन असली सुख क्या हेै उसे मालूम नही क्योकि जिस सुख के पीछे इंसान भाग रहा हेै वह क्षण भंगुर है आने जाने वाला है,क्योकि जब पूरा संसार की ही नाश्वान हेेै तो उसके अंदर विद्यमान वस्तुए भी क्षण  भंगुर हैै। जो आती जाती रहती है आज जो मेरा हेै वह कल किसी और का होगा ओर परसो किसी और होगा। लेकिन असली सुख हेै वह ईश्वर की  भक्ति कर मोक्ष के साथ हेै। क्योकि आत्मा जन्मो जन्मातरो से अपने प्रीतम ईश्वर से पिछडी हुई है इंसान चोले मे आकर वह ईश्वर के प्राप्ति कर अपने जन्म मरण के चक्र को खत्म कर सकती हेै।

 मनीषी श्री संत ने कहा- इंसान भगवान को पाने के लिए दिन रात भागदौड किए हुए है लेकिन उसे मालूम नही है कि जिसे वह ढंूढ रहा है वह उसके साथ ही है। इंसान सोच मे डूब कर यही अभिलाषा करता रहता है कि -दरिद्रता, दुश्मनी, अपयश और न्यायिक दंड आदि इन सबका आगमन मेरे जीवन से कोसो दूर हो और हम सदा सुखी बने रहें, यही कामना बनी रहती है लेकिन ऐसा संभव हेै कि हवा भी चले और पेड़ का पत्ता भी न हिले? सिक्के का एक पहलू तो हम अपने हाथ में ले लें और दूसरा हमारे हाथ से बाहर रहे। नहीं परिवर्तन में व्यस्त प्रकृति के आंचल में ऐसा संभव नहीं। जो कुछ इस प्रकृति में जन्मा है, उसे प्रकृति के नियम बांधेंगे ही। सुख के इस सागर को आत्मबोध या परमात्मबोध कहा जाता है। वही परम सुख है।

मनीषी श्री संत ने आगे फरमाया- इंसान सोचता है कि वह ऊंचाईयो के शिखर को चूमे  बिना संघर्ष कर बैठा बिठाये मुझे हर वस्तु मिल जाये कोई संघर्ष ओर कर्म ना करना पडे पर ऐसा संभव नही है क्योकि यह संसार कर्म भूमि है जो जैसा बोता है वैसा ही काटता है, यहां तो इस हाथ दे ओैर उस हाथ ले वाला प्रचलन है। यहां संसार के अंदर उधार का सौदा नही है। अनुसार विपरीत स्थितियों को अनुकूल करने का प्रयत्न करना ही संघर्ष है, लेकिन इसके साथ विश्वास का होना आवश्यक है। विश्वास संघर्ष की थकान को महसूस नहीं होने देता। यह एक सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है। इसलिए संघर्ष के दौर में अपनी मेहनत पर आस्था रखनी चाहिए। साथ में ईश्वर प्रार्थना से मिली शांति और संगी-साथी की सराहना मिल जाए, तो क्या कहने।

मनीषी श्री संत ने अंत मे फरमाया- जिंदगी का हर पल हमें कुछ सिखा कर जाता है, लेकिन यदि हम बिल्कुल भी होश में नहीं हैं तो हम इसका लाभ नहीं ले सकते। यदि आज भी जीने के तौर-तरीके नहीं सीखे गए और इन भूलों को दोहराते रह गए तो आने वाला भविष्य अंधकरामय हो सकता है।

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