सारा संसार अपनी उदासी और अपने दुखों का कारण दूसरे व्यक्ति को मान रहा है - मुनिश्रीविनयकुमार जी आलोक

चंडीगढ,22 मार्च, सारा संसार अपनी उदासी और अपने दुखों का कारण दूसरे व्यक्ति
को मान रहा है। वह दुखी क्यों है, उदास और हताश क्यों है? इसके लिए वह दूसरों
को कारण मानता है। समाज का प्रत्येक व्यक्ति उसके दुख का कारण है। वह उदास है,
इसलिए नहीं कि उसने अपने मन में विकार पाल रखा है, बल्कि इसलिए कि संसार के
लोग नहीं चाहते कि वह खुश रहे। चौराहे पर खड़े लोग एक-दूसरे को अपने दुख और
अपनी उदासी के लिए उलाहना दे रहे हैं। - प्रत्येक व्यक्ति यही कह रहा है कि
आजकल सभी लोग बुरे हो गए हैं और केवल वही सही है। ऐसे ही लोग मानसिक रूप से
दरिद्र होते हैं। अगर वे दरिद्र हैं तो अपने कारण से किसी दूसरे के कारण नहीं,
लेकिन अपनी भूल कोई नहीं मानता। अपना चेहरा कोई नहीं देखना चाहता, क्योंकि उसे
अपनी कुरूपता से डर लगता है। दूसरे की कुरूपता से उसे मजा आता है। यह बड़ी
अजीब बात है। लोग दूसरे की प्रसन्नता में मजा लेते हैं और ऐसे लोग अपनी ही
उदासी और दुख में मजा लेते हैं।यह एक तरह की मानसिक कुरूपता है जिससे हमें
मुक्ति पाना बेहद जरूरी है। ऐसे लोगों के जीवन में न कोई प्रेम होता है और न
कोई आकर्षण होता है। ऐसे ही लोग प्रत्येक सुंदरता और आकर्षण के विरोधी होते
हैं। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्रीविनयकुमारजी आलोक ने कहे।

मनीषी श्री संत ने कहा- इंसान के दुखी होने का एक ही कारण है कि वह सब प्रकार
के दोषो आरोपो के लिए दूसरो को ही दोषी मानता है और जो सब कुछ करने मे सक्षम
है उसके आगे गिले शिकवे करता हेै दोष देता रहता लेकिन वह अगर ठंडे दिमाग से
सोचे कि जिसके आगे कोई जोर नही चल सकता जो खुद सारे ब्राहमण का स्वामी है तो
फिर क्यो ना जिसका कार्य है उसी के भरोसे छोड दिए तो चिंता व नकारात्मक विचार
उत्पन्न ही नही हो सकते हैैं। परमात्मा ने तुम्हें सुंदर बनाया है, लेकिन तुम
कुरूप बनकर दूसरों को दुखी कर रहे हो। अपनी कुरूपता से किसी को दुखी करने का
तुम्हें कोई अधिकार नहीं है। आप कुरूप रहना चाहते हो, रहो। लेकिन अपनी कुरूपता
से दूसरों को क्यों दुखी कर रहे हो। अपना कुरूप चेहरा, उदास, दुखी और हताश
मुखमंडल दूसरों को क्यों दिखाना चाहते हैं। आप केवल यह साबित करना चाहते हो कि
मैं दुखी हूं। सभी लोग मेरे पास आएं और मुङो अपनी सहानुभूति दें, मुङो प्रेम
करें, लेकिन आप किसी को प्रेम न करें। इसी स्वार्थ के कारण ऐसे उदास, हताश
लोगों से सभी घृणा करते हैं। ऐसे ही लोग न स्वयं जीना चाहते हैं और न दूसरों
को जीने देना चाहते हैं। यह उदासी आज पूरे समाज में प्रत्येक परिवार में बड़ी
तेजी से फैल रही है। पति-पत्नी, बाप-बेटा, भाई-भाई एक दूसरे से दुखी हैं।

मनीषी श्री संत ने अंत मे फरमाया- जो पदार्थ के स्थान पर जीवन के नियमों को
जानना, समझना, प्रयोग करना और अंत में जीवन जीने का तरीका सिखाता है। अध्यात्म
जीवन-दृष्टि और जीवन-शैली का समन्वय है। यह जीवन को समग्र ढंग से न केवल देखता
है, बल्कि इसे अपनाता भी है। आज कई लोग ऐसे हैं, जो अध्यात्म से नितांत
अनभिज्ञ हैं, लेकिन वही अध्यात्म की भाषा बोल रहे हैं। आज अध्यात्म के तत्वों
की कार्यशालाओं में चर्चा की जाती है। यह कटु सत्य है कि आध्यात्मिक भाषा
बोलने वाले कुछ लोगों का जीवन अध्यात्म से नितांत अपरिचित, परंतु भौतिक साधनों
और भोग-विलासों में आकंठ डूबा हुआ मिलता है। आज के तथाकथित कई अध्यात्मवेत्ता
भय, आशंका, संदेह, भ्रम से ग्रस्त हैं, जबकि अध्यात्म के प्रथम सोपान को इनका
समूल विनाश करके ही पार किया जाता है।

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