संसार एक मेला है : मुनिश्रीविनयकुमार जी आलोक

चंडीगढ, 25 मार्च-यह संसार है,यहां अनगिनत लोग हैं। तरह-तरह के जीवन हैं। तरह-तरह की जातियां हैं। तरह-तरह के विकार हैं। कोई किसी की प्रकृति का है, तो कोई विकारों से युक्त है। कहीं मनुष्यों का मेला है, कहीं पेड़-पौधों का जंगल। कहीं पानी का सुंदर प्रवाह है, तो कहीं सागर की लहरों का खेल। संसार के सभी लोग इन विभिन्नताओं का उपयोग नहीं कर सकते। सबके अपने-अपने क्षेत्र हैं। अपना-अपना संस्कार है। अगर आप इसका अतिक्रमण करेंगे, तो भटक कर रह जाएंगे। इसलिए आपके आस-पास एक विराट दुनिया है, जो आपके साथ चल-फिर रही है। उस दुनिया में आप कितने को जानते हैं। अगर आप सभी को जानने की कोशिश करेंगे, तो समय साथ नहीं देगा, क्योंकि जिंदगी इतनी लंबी नहीं है। संस्कार भूमि इतनी विराट नहीं है। इसमें कुछ ही लोग आपके हैं। अगर इनसे अधिक और अपेक्षाएं करेंगे, तो अपेक्षाओं में ही जीवन समाप्त हो जाएगा। इसलिए आज तक किसी को पूरी तरह सुखी और संतुष्ट नहीं देखा होगा। लोगों को चिंताएं जला रही हैं।  अपनी भोग तृप्तियों की गुलामी में खट रहे हैं, पर वे अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अपने परिवार, अपने बच्चों और समाज के लिए सब कुछ कर रहे हैं, पर इस सबके पीछे उनकी अपनी पद प्रतिष्ठा और मान-अपमान के कारण निहित हैं। अगर आप भी इस गम का शिकार होना चाहते हैं, तो चल पडि़ए किसी रास्ते पर। अनेक लोगों केसाथ। अनेक अपेक्षाओं के साथ। तब फिर देखिए कि जिंदगी को क्या मिलता है। अंतिम सत्य परमात्मा है। ये शब्द मनीषी श्री संतविनयकुमार जी आलोक ने कहे।
मनीषी ने कहा- मृत्यु जब भी आती है-संस्कार लेकर, प्रारब्ध बनकर और कर्मफल की क्रमश: गति बनकर। सब धोखा दे सकते हैं, परंतु मृत्यु कभी नहीं। अगर मृत्यु की तरह हर कोई वफादार हो जाए, तो जिंदगी कभी बेवफा नहीं हो सकती। अफसोस यह सब जानकर और समझकर भी लोग एक-दूसरे से आगे बढऩे की होड़ में लगे हुए हैं। उस व्यक्ति का वर्तमान भी ठीक रहेगा, जो ठहर गया है। उसके लिए न तो वर्तमान में कोई उत्सव है, और न ही कल का शोक। बुद्ध पुरुषों के आत्मज्ञान की दुनिया में कोई संशय नहीं, कोई तर्क नहीं, आगे बढ़ जाने की कोई होड़ नहीं, आवागमन का कोई भय नहीं, छल-प्रपंच के लिए कोई जगह नहीं होती। आज ही प्रयास करें, कल के भरोसे न रहें। स्वयं के अस्तित्व की तलाश में जुटें। स्थितप्रज्ञ बनने का प्रयास करें। यही जीवन का सच्चा रूपांतरण होगा।
मनीषी श्री संत ने अंत मे फरमायाा-अहंकार से भावुकता का मिलन और संयोग बड़ा ही खतरनाक होता है। यह एक बड़ा विषम दुर्योग है। अहंकारी यदि भावुक प्रकृति का हो तो संदिग्ध चरित्र का निर्माण करता है। यह कब और कैसे व्यवहार करेगा, कहा नहीं जा सकता है। यह दो विरोधी प्रवृत्तियों में जीता है, जहां कोई मेल नहीं है, कोई सामंजस्य-तारतय नहीं है। अहंकार का नकारात्मक स्वरूप जितना भयावह और भीषण होता है, उसका विधेयात्मक पक्ष उतना ही सृजनशील हो सकता है। अहंकार की प्रकृति प्राण, साहस, दृढ़ निश्चय और संकल्प से भरीपूरी होती है। अहं प्रधान व्यक्ति का रचनात्मकता की ओर उठा कदम उसे अपार धैर्यवान, सहनशील और सहिष्णु बना देता है। एेसा संकल्पवान जब एक बार कोई काम हाथ में लेता है तो अपार धैर्य के साथ उसको पूरा करने के लिए संलग्न हो जाता है। यह मूढ़ता का प्रबल पर्याय है। इसमें ग्रहणशीलता नहीं होती। वह दूसरों जैसा श्रेष्ठ बनना नहीं चाहता, उससे कई गुना श्रेष्ठ दिखना चाहता है। इसलिए दूसरों की तुलना में अपने को विशिष्ट मान बैठने पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। बलिष्ठता, सुंदरता, संपन्नता, पद, अधिकार आदि उसके अनेक कारण हो सकते हैं। कई बार नहीं, बल्कि बारंबार भ्रम ही उसका निमित्त बना हुआ होता है।

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