बलि प्रथा का अंत हो : आचार्य श्री महाश्रमण

"बलि प्रथा का हो अंत"- आचार्य महाश्रमण
Acharya Mahashramanji at Bal Mandir Kathmandu 

दिनांक - २२ अप्रेल २०१५
अध्यात्म समवसरण, बाल मंदिर, काठमांडू, नेपाल। JTN. आर्हत वाड्मय में धर्म को उत्कृष्ट मंगल बतलाया गया है। दुनिया में मंगल वनिर्विघ्नता की कामना की जाती है व उसके लिए किसी शक्तिशाली आत्मा का स्मरण या शरण ली जाती है। दुःख में भक्त अपने प्रभो का स्मरण करते हैं। मेरे मन में आता है कि छोटी-मोटी बाधाओं के लिए महापुरुषों को तंग न करके उन्हें समता से सहने का प्रयास करना चाहिए। सबसे बड़ा मंगल धर्म है जो अहिंसा, संयम व तप में निहित है। अहिंसा एक भगवती है, जो सबका क्षेम-कुशल करने वाली है। न सिर्फ आदमी के प्रति बल्कि पशु के प्रति भी अहिंसा का पालन होना चाहिए। मेरा तो देवी देवताओं से भी यही अनुरोध है कि वे पशु बलि से संतोष का अनुभव न करें व पशुओं को माफ़ कर दें। बलि प्रथा का अंत हो। हम साधुओं को तो यह निर्देश दिया गया है कि उनके कारण से चींटी भी न मर जाए इसलिए देख देख कर चलो। खुले मुंह बोलने से वायु काय की जीव हिंसा हो सकती है, इसीलिए मुख वस्त्रिका रखते हैं। भोजन बनाने में हिंसा होती है इसलिए साधुओं के लिए माधुकरी भिक्षा निर्दिष्ट की गई है। भारत व नेपाल ऋषियों व संतों का देश है, यह सौभाग्य की बात है।सबको आत्म तुल्य समझो व किसी के जीने में बाधक मत बनो। जो तुम्हारे लिए प्रतिकूल है वह दूसरोंके लिए भी प्रतिकूल ही है। धर्म की बात को सुनो और उसे आत्मसात कर जीवन में अपनाने की कोशिश करो। हम दिल्ली से चलकर काठमांडू आये हैं। यहां भी पवित्रता के साथ सद्भावना, नैतिकता व नशा मुक्ति का विकास हो।

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