बुद्धि का प्रयोग अच्छे व धार्मिक कार्यों में हो - आचार्य श्री महाश्रमण जी

H.H. Aacharya Shri Mahashraman ji Praying for the People of  Nepal. 
 दिनांक ३ मई २०१५, काठमांडू, नेपाल, दुनिया में ऋजुता, सरलता देखने को मिलती है तो माया का प्रयोग भी लोग करते हैं। आदमी कभी कभी यथार्थ को ढकने का प्रयास कार्य है। यथार्थ को ढकने के लिए माया का उपयोग कार्य है। परन्तु वह माया कर्म बंध कारक मानी गई है। पाप कर्म का बांध करने वाली मानी गई है। 
आचार्य प्रवर ने फरमाया कि झूठ बोलने वाले को जितना भयभीत होना पड़ता है, जितना दुष्प्रयत्न करना पड़ता है, सत्य बोलने वाले को ऐसा कुछ भी नहीं करना पड़ता। एक प्रकार से माया के प्रयोग करने वालों के बुद्धि का क्षयोपशम है। लेकिन इसका उपयोग माया में नहीं करना चाहिए। बुद्धि वोही अच्छी होती है जो साधना में लगती है, अच्छे कार्यों में लगती है। पाप कर्म में बुद्धि का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
वह व्यक्ति महात्मा होता है जिसके जो मन में होता है, वही वचन व आचरण में होता है। जिसके मन वचन व आचरण में असमानता होती है वह दुरात्मा होता है।
दुनिया में अनेक लोग सामान्य जीवन जीते हैं। बिज़नस करते हैं, नौकरी करते हैं, खाते पीते हैं, सोते हैं। बस यही उनकी जिंदगी है। हम लोगों कप साधना का अवसर मिला है इस रूप में हमारा जीवन विशेष हो गया। हमारे भी रूटीन काम चलते हैं पर उसके साथ साधना जीवन में प्राप्त है। हमें ना सर्विस करनी पड़ती, ना बिज़नस का झंझट, ना खाना बनाना, ना बाज़ार से सामान खरीदना पड़ता है। हमें तो बना बनाया मिलता है। इस मायने में हम बने बनाये राज कुमार हैं
एक दृष्टि से हम याचक भी हैं। हमे घर घर जाकर रोटी कपड़ा आदि मांगने पड़ते हैं। हाथ फैलाना भी कोई सामान्य बात नहीं होती। रोटी- कपड़ा मांगना भी परिषह है। हमे मांगने का अधिकार है । गृहस्थ के लिए मांगना शर्म की बात है। पर हम साधुओं के लिए मांगना भी गौरव की बात है। क्यों की हमने पहले त्याग किया।
13 नियम मोक्ष दिलाने वाले : हमे 13 करोड़ की सम्पति 5 महाव्रत, 5 समिति, 3 गुप्ति के रूप में दीक्षा लेते ही गुरु से मिल जाती ही है। इस 13 करोड़ की पूंजी से हम मोक्ष के सुख खरीद सकते हैं। हमे इस सम्पति की अक्षुणत्ता बनाये रखने का प्रयास करना है। इन 13 नियमो के प्रति हमारी जागरूकता रहे। कार्यक्रम में हाजरी का वाचन किया गया।
आज पूज्यप्रवर का प्रवचन दुगड़ जी के निवास स्थान पर ही हुआ। काठमांडू में अब जनजीवन सामान्य हो गया है। अज के प्रवचन में लगभग 800 श्रावक श्राविकाओं की उपस्थिति थी।

जप का प्रयोग: पूज्यप्रवर ने प्रवचन से पहले जप का प्रयोग किया। पूज्यप्रवर ने जप प्रयोग के सन्दर्भ में कहा कि भूकंप में कालधर्म को प्राप्त व दुखी लोगों के प्रति आध्यात्मिक मंगल अनुकम्पा एवं मंगल कामना करना चाहते हैं। उनकी आत्मा को शांति मिले, दुःख मुक्ति मिले, चित्त समाधि मिले और हमारी भी निर्जरा हो।

Monks and Nuns of Jain Terapanth Sangh are Praying for the People who have lost their lives in the Earth Quake in Nepal.

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