सत्संगति चित को प्रसन्न करने वाली होती है - आचार्य श्री महाश्रमण


Aacharya Mahashraman ji at Kathmandu Nepal, during Non-Violence March (Ahinsa Yatra)
16 मई 2015, JTN काठमांडू, 
परमपुज्य महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण ने फरमाया कि सत्संगति महत्वपूर्ण होती है। साधु तो चलते फिरते तीर्थ होते हैं। साधुओं का सम्पर्क अच्छा है, वाणी श्रवण का मौका मिलना और भी अच्छा है। साधु की वाणी बुद्धि की जड़ता को दूर करती है और भाषा में सच्चाई आती है। सत्संगति चित को प्रसन्न करने वाली होती है। अच्छे मनुष्यों की संगति भी अच्छी है। अच्छा साहित्य पढ़ना भी अच्छा है। पुज्यवर ने "सत्संगत की महिमा अपरमपार है" गीत का संगान किया।
पुज्यवर ने कहा कि व्यक्तियों को अच्छे आदर्शों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए। पुज्यवर ने कार्यक्रम में उपस्थित नेपाल सरकार के मंत्री को संबोधित करते हुए कहा कि राजनीति सेवा का माध्यम है। राजनीति में नैतिकता रहे।
कार्यक्रम में उपस्थित नेपाल सरकार के मंत्री ने पुज्यवर को वंदना कर कहा कि मेरा यह पुण्यकर्म था कि आपका प्रवचन सुनने का मौका मिला। आपके सूत्रों से मुझे प्रेरणा मिलती है। आचार्य श्री का पूर्व नाम मुदित था। आपको देखकर लगता है कि मुदित नाम आपसे जुड़कर सार्थक हो गया है। आपमें उज्जवलता, मर्मस्पर्शी प्रवचन, प्रज्ञायुक्त विचार का अद्भुत समीक्षण है।
मुख्य नियोजिका साध्वी विश्रुत विभा जी ने अपना प्रेरणादायी उद्बोधन दिया। कई देशों की यात्रा कर गुरुचरणों में उपस्थित समणी शुक्ल प्रज्ञा व समणी उन्नत प्रज्ञा जी ने पूज्यवर के दर्शन कर अपने भाग्य को सराहा। समणी शुक्ल प्रज्ञा जी ने मियामी, दुबई में चल रहे कार्यों की अवगति दी। समणी सुमन प्रज्ञा जी ने गीत का संगान किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया ।



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