मन में हो कल्याणकारी संकल्प : आचार्य श्री महाश्रमण

दिनांक:- 29.12.2015,  सुपौल । तेरापंथ धर्म संघ के ग्यारहवें अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने प्रातःकालीन उद्बोधन में अर्हत वाड्ग्मय के सूत्र को उदघृत करते हुए फरमाया कि मन को एक घोड़े के रूप में देखा गया है। घोड़ा अच्छा भी होता है। और कोई घोड़ा उथपथगामी भी हो सकता है। शास्त्रकार ने यहाॅ मन को दुष्ट अश्व के रूप में बताया है कि मन एक दुष्ट घोड़ा है। बड़ा भयकर भी है और साहसिक भी। साहसिक शब्द के दो अर्थ होते है- एक वह व्यक्ति जिसमे साहस होता हैं और एक बिना सोचे समझे काम करने वाला। मन का घोडा जब दुष्ट अश्व के रूप में होता है तब पता नहीं आदमी को कहाँ ले जाता है। कौनसा गलत काम आदमी से करवा देता है।
मन का अच्छा पक्ष भी है और मन का बुरा पक्ष भी है। अंधेर पक्ष भी है उजियारे का पक्ष भी है। अंधेर पक्ष के बारे में कहा गया कि मन बड़ा लोभी, चंचल, लालची और चोर है। मन के कहने अनुसार नही चलना चाहिए। यह पल पल में पता नही क्या क्या विचार ला देता है ।  यह मन का अंधेर पक्ष बताया गया है। मन का उजला पक्ष भी हैं। मन के द्वारा अनुप्रेक्षा कर सकते है। बारह और सोलह भावनाएं कर सकते है। मन से मंगलकामना कर सकते हैं। मन से चिन्तन, मनन स्मरण कर सकते है। तो मन का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। मन अच्छा और सुमन भी है। मन दुर्मन भी बन सकता है। अगर मन में आवेश आग्रह है। तो निर्णय भी गलत हो सकता है। मन में कभी कभी बुरे विचार भी आ सकते है। उस समय वीतराग प्रभु के नाम का स्मरण करते रहना चाहिए और अपने आराध्य की शरण ले लेनी चाहिए। ताकि हम पाप कर्म के बंध से बच सके।
इस अवसर पर ज्ञानशाला के बच्चो द्वारा भी प्रस्तुति दी गई।

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