अदत्तादान से बचे : आचार्य श्री महाश्रमणजी

24.12.2015, निर्मली. तेरापंथ धर्म संघ के ग्यारहवें अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने प्रातःकालीन उद्बोधन में अर्हत वाड्ग्मय के सूत्र को उदघृत करते हुए फरमाया कि जैन धर्म में अठारह पाप बताए गए है। उसमें तीसरा पाप है - अदत्तादान । जो चीज नहीं दी गई है उसको उठा लेना अर्थात चोरी करना। चोरी करना पाप है। 
आचार्य प्रवर ने आगे फरमाया कि प्रेम तब टुटता है जब स्वार्थ की दीवार बीच में आ जाती है। दो मत हो जाते है। संयुक्त परिवार में कठिनाई हो सकती है। लेकिन आपस में दुश्मनी नहीं  होनी चाहिए। एक दुसरे को देखने से गुस्सा आ जाए ऐसी स्थिती नही होनी चाहिए। भाई भाई के बीच में स्वार्थ दीवार के रूप में आ जाती है तो सम्बन्ध विच्छिन्न हो जाते है, प्रेम का घागा टुट जाता है। प्रेम का घागा टुटने के बाद जोड़ना बड़ा मुश्किल है। परिवारो में अन्याय किसी के साथ ना हो, बुरा किसी का ना हो इतना हमें प्रयास करना चाहिए। साधु बन जाने के बाद संसार से सम्बघ नही होता है फिर धर्म सधं का सम्बघ मुख्य होता है। संघीय संबंधों में सबसे मुख्य संबंध गुरू के साथ होता है। हमारे मन में एक संघ के प्रति भी निष्ठा और प्रामणिकता की भावना रहनी चाहिए।
इस अवसर पर तेरापंथ युवक परिषद बालोतरा, हेमन्त बैद, माणकचन्द नाहटा द्वारा गीत प्रस्तुत किया गया। रोनक नाहर, कमला नाहटा, सायर सिंघी ने अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का संचालन मुनि श्री दिनेशकुमारजी ने किया।



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  1. Guru Dev ke parwachan Dil ko jakhjoranee wale hotee Hai. Mari jindigi . Mai kuch puny Karam Kai Hai honge Jo Essa Dharm or Guru Melia

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  2. Guru Dev ke parwachan Dil ko jakhjoranee wale hotee Hai. Mari jindigi . Mai kuch puny Karam Kai Hai honge Jo Essa Dharm or Guru Melia

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    1. बिलकुल सही कह रहे है आप ।
      हमारे भाग्य बड़े बलवान, मिला यह तेरापंथ महान ।

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      हमारे भाग्य बड़े बलवान, मिला यह तेरापंथ महान ।

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