अहंकार से बचे : आचार्य महाश्रमण

 Acharya Mahashraman at Nirmali Bihar
Acharya Mahashraman at Nirmali Bihar 
23.12.2015 निर्मली. महातपस्वी महामनस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने प्रातःकालीन उद्बोधन में अर्हत वाड्मय के सूत्र को उदघृत करते हुए फरमाया कि अहंकार को मृदुता से जीतना चाहिए। अध्यात्म की साघना की दष्टि से और व्यवहार की दष्टि से भी अहंकार आदमी का शत्रु होता है।
कितनी बार हमारी आत्मा बेर की गुठली के रूप में पैदा हो गई होगी कितनी बार हमारा तिरस्कार हुआ होगा। कितनी बार हम स्थावरकाय के जीव बनें होगे। सौभाग्य से अब मनुष्य जन्म मिला है। तो वर्तमान मनुष्य जीवन में भी बड़ा कहलाने वाला आदमी कभी छोटा बन जाता है। दुसरो पर हुक्म चलाने वाले को कभी दुसरो के हुक्म में रहना पड़ता है। इन बातो पर विचार करके हम यह घारणा बनाये कि हमे धमण्ड नही करना चाहिए।  मनुष्य को घन का भी घमण्ड नही करना चाहिए। धन के प्रति ज्यादा आसक्ति व मोह भी नही करना चाहिए।  धन का दुरूपयोग भी नही करना चाहिए।  ना ही ज्ञान का, रूप का, तपस्या का धमण्ड करना चाहिए। ज्ञान प्राप्त  करना है तो घमण्ड को दूर रखना चाहिए। पूज्यों का सम्मान करना चाहिए. आदमी अवस्था से पूज्य होता है या संयम पर्याय से पूज्य होता है।  जो विघार्थी  विनय पुर्वक ज्ञान लेता है उसका ज्ञान अघिक फलवान हो सकता है। शिक्षक गुरू है उनके प्रति भी विनय का भाव रखना चाहिए।

Acharya Mahashraman welcomed by Gyanshala children at Nirmali
Gyanshala children welcoming H.H. Acharya Mahashraman
at  Nirmali Bihar
इस अवसर पर ग्रामवासियों ने अहिंसा यात्रा के तीन उद्देश्य सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के संकल्प ग्रहण किए। तेरापंथ संभा के अघ्यक्ष बाबुलाल जी सुराणा, अघ्यक्ष राम लखन यादव, अरूण कुमार ने अपने विचार प्रस्तुत किए। इस अवसर पर तेरापंथ महिला मंडल, तेरापंथ युवक परिषद, तेरापंथ कन्या मंडल, एस.एन.एस स्कुल के बच्चो द्वारा स्वागत गीत प्रस्तुत किया गया। ज्ञानशाला के छोटे-छोटे बच्चो द्वारा पुज्य प्रवर के स्वागत मे रोचक प्रस्तुति दी गई। प्रजापिता ब्रह्मकुमारी विश्वविघालय की रजू दीदी ने अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का संचालन मुनि श्री दिनेशकुमारजी ने किया।

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