भोग से आत्मा का शोषण, त्याग से आत्मा का पोषण : आचार्य श्री महाश्रमण

 गुलाबबाग, 27 जन. परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज अपने प्रात:कालीन उद्बोधन ने फरमाया कि शरीर को बाहर से सुन्दर बनाने के लिए आदमी न जाने क्या-क्या करता है। कितने प्रकार के फैशनेबल वस्त्र व आभूषण आदि। इसमें बाहर से आदमी सुन्दर दिखने भी लगे ऐसा हो सकता है लेकिन जब तक अंतरात्मा सुन्दर न हो तब तक आदमी के बाहर की सुन्दरता आध्यात्मिक जीवन के साथ-साथ व्यवहारिक जीवन में सुन्दर नहीं कही जाती और आत्मा को सुन्दर बनाने के लिए त्याग करना पड़ता है। आत्मा को सुन्दर बनाने के लिए यहीं एक उत्तम साधन है। त्याग से आत्मा का पोषण होता है। आत्मा को बेहतर पोषण मिलने पर वह परम को पाने के पथ पर अग्रसर होती है।  त्याग का महत्व आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत बड़ा है तो वहीं व्यवहारिक जीवन में भी त्याग की शक्ति का कोई जोड़ नहीं है। अभाव के कारण से यदि कोई आदमी भोग नहीं कर पा रहा है इसका यह मतलब कदापि नहीं होता कि वह त्यागी है। त्यागी वह आदमी कहलाता है जिसके पास उपभोग का साधन उपलब्ध हो इसके बावजूद भी वह उसका प्रयोग न करे, उससे मुंह मोड़ ले वह त्याग कहलाता है। त्याग से आत्मा का पोषण होता है। भोग से शरीर का पोषण हो सकता है लेकिन आत्मा का नहीं। इसके विपरित भोग से शरीर का पोषण हो न हो लेकिन आत्मा का शोषण होने लगता है। त्याग परिग्रह का हो सकता है। त्याग झूठ का हो सकता है। त्याग हिंसा का हो सकता है। त्याग रात्रि भोजन का हो सकता है। सभी प्रकार के व्यसनों का त्याग किया जा सकता है। गृहस्थ जीवन में त्याग के महत्व को समझाते हुए आचार्यश्री ने कहा कि गृहस्थ जीवन में जितना त्याग बढ़ता है उतना ही वह गृहस्थ सुपात्रता की ओर अग्रसर होता है। सुपात्र होने पर घर में सुख-शांति आती है और उसका पारिवारिक जीवन प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने लगता है। स्वार्थ व सर्वार्थ की व्याख्या करते हुए कहा कि स्वार्थी आदमी का जीवन संकीर्ण होता है। वह अपने से आगे की सोच भी नहीं सकता। उसकी सोच के अनुसार वह मैं तक ही सीमित रह जाता है। इसके विपरीत स्वहित की बात छोड़ पूरे समाज के हित में सोचने वाला आदमी सर्वार्थी होता है। वहीं समाज में स्थापित होता है। परमार्थ को बहुत ऊंची चीज बताते हुए कहा कि परमार्थी आदमी अपने भौतिक सुखों को छोड़कर परम के प्राप्ति के पथ पर चलता है। इस बात को ऐसे भी कहा जाता है कि परम को पाने के लिए किया गया पुरूषार्थ परमार्थ कहलाता है। परिग्रह का त्याग, गृहस्थी का त्याग व भोजन का त्याग ये तीन मनोरथ श्रावक के होते हैं। इसकी उन्होंने विस्तृत व्याख्या की।

पूज्यप्रवर के स्वागत में भजन मंडली ने ‘खुशियों के घन मंडाराए, चरणों में शिश झुकाएं’ गीत की प्रस्तुति की और महिला मंडल ने आचार्य श्री के स्वागत में गीत की प्रस्तुित दी।

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