प्रतिस्रोत से पाएं भीतर का खजाना

कटिहार.13, जनवरी.
महातपस्वी महामनस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने प्रातःकालीन उद्बोधन में फरमाया कि सांसारिक सुखों के मार्ग पर चलना आसान है, लेकिन संसार में रहने के बावजूद सांसारिक दिशा के विपरीत दिशा में चलने की हिम्मत रखना ही मनुष्य के जीवन की विशेषता है। यही मार्ग उसके जीवन को धन्य बनाता है और मोक्ष के द्वारा तक ले जाता है। सांसारिक मार्गों पर चलना अनुस्रोत कहलाता है तो इससे अलग आध्यात्मिक मार्ग बनाकर आत्मसाक्षात्कार करना प्रतिस्रोत का उत्तम उदाहरण है। झूठ, फरेब, लालच, हिंसा, मोह-माया अनुस्रोत के उदाहरण हैं तो अहिंसा, संतोष, सच्चाई, सत्कर्म प्रतिस्रोतगामिता के सबल उदाहरण हैं। प्रतिस्रोत में चलने का अभ्यास करना चाहिए ताकि जीवन सुखमय और शांतिपूर्वक व्यतीत हो और इह लोक के साथ परलोक को भी संवार सके।
आचार्य प्रवर ने आगे फरमाते हुए कहाॅ कि आदमी रोटी, कपड़ा, मकान, आभूषण, धन, शादी, बच्चों आदि के मोह माया में पड़ जाता है। अपने इन्हीं विचारों व ईच्छाओं की पूर्ति में वह परेशान व दुखी होता रहता है, किन्तु इसके विपरीत साधु-संत इन सब समस्याओं से दूर रहकर अपने जीवन को सच्चाई व अहिंसा के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं और अपने मानव जीवन को सफल बनाते हैं। अनुस्रोत व प्रतिस्रोत को और विस्तार देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे जब हवा चल रही होती है तो उस हवा के अनुकूल चलना आसान होता है लेकिन हवा के विपरीत चलना कठिन होता है। ठीक उसी प्रकार अच्छाई के मार्ग पर चलना कठिन व बुराई के मार्ग पर चलना आसान होता है। संतों के बताए मार्ग पर चलने से मनुष्य का कल्याण हो जाता है। संतों का समागम ही बहुत दुर्लभ है। यदि मानव को संतों का सानिध्य मिल जाये तो भी उसका जीवन सफल हो जाता है। साधु-संतों की अल्प समय की संगति भी मानव का कल्याण करने में सक्षम है।

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