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कषायों से मुक्त होने का प्रयास करें : आ.श्री महाश्रमण

आचार्य महाश्रमणजी के नेतृत्व में अहिंसा यात्रा का प्रथम बंगाल प्रवेश
शंख की मंगल ध्वनि, ढोल-नगाड़ों की थाप, स्कूली बच्चों के कदम ताल और बंगाल के परिधान में सजी बालाओं ने ऐसा समां बांधा, लगा पूरा बंगाल स्वागत को आ पहुंचा है। ‘‘जय-जय ज्योतिचरण, जय-जय महाश्रमण’’ के जयघोष के साथ भव्य स्वागत          



दालखोला, 3 फर.। महातपस्वी महामनस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने प्रातःकालीन उद्बोधन में फरमाया कि आदमी कभी-कभी शारीरिक व्याधियों के कारण वमन करता है। इस वमन को एक अलग रूप से प्रदर्शित करते हुए कहा कि आदमी वमन करे कषायों का, अपने अंदर बैठे दुर्गुणों का, जो आत्मा को परम की प्राप्ति नहीं होने देते। मानव जीवन के अंदर क्रोध, मोह, लोभ, लालच व अहंकार जैसे कषाय अहितकर हैं। इनका परित्याग करना चाहिए। यदि इनका परित्याग या वमन मनुष्य कर दे तो उसकी आत्मा पवित्र, पुष्ट व परम पथगामिनी बन सकती है। आध्यात्मिक जगत का सबसे सच्चा मित्र आत्मा को बताते हुए आचायश्री ने फरमाया कि आदमी की आत्मा पवित्र हो तो वह परम मित्र व अपवित्र या कलुषित हो तो शत्रु भी होती है। मानव जीवन में यदि सचमुच विकास के पथ पर अग्रसर होना है तो अपनी आत्मा को अपना मित्र बनाएं और उसे पवित्र बनाएं ताकि जीवन का कल्याण हो सके। आचार्यश्री ने कहा कि मित्र किसके होते हैं जो किसी ओहदे वाला हो, जो धन-संपदा वाला हो। गरीब काकोई मित्र नहीं होता। इसलिए कहा गया है ‘‘तुलसी पास गरीब को कौन आवत कौन जात, एक बिचारो श्वांस है, आत-जात दिन-रात।’’ गरीब का कोई मित्र नहीं, उसके पास कोई आता-जाता नहीं है सिवाय उसकी सांस के। इसलिए अपनी आत्मा को मित्र बनाएं।  युग व समय-समय के हिसाब से और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकास हो रहा है,  लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से ह्रास ही हो रहा है। पहले परम की प्राप्ति हो जाती थी, अब नहीं होती। पहले वीतराग हो जाता था, भगवान के दर्शन हो जाते थे लेकिन अब राग जाता नहीं और भगवान के दर्शन भी दुर्लभ हो गया है। 
आचार्य श्री के सान्निध्य में सभी ग्रामवासियो ने जीवन में सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति का संकल्प लिया। पूज्य प्रवर के स्वागत मे मुनि योगेश कुमार जी और मुनि कुमारश्रमण जी ने अपने विचार प्रस्तुत किए। ज्ञानशाला के बच्चों ने ‘‘करते वेलकम हम भगवान का’’ पर सुंदर प्रस्तुति दी वहीं कन्या मंडल, महिला मंडल व युवक परिषद ने समवेत स्वर में आचार्यश्री की आरती गाई तो पूरा पंडाल ओम अर्हम् के मंगल उद्घोष से गुंजायमान हो गया। कार्यकम का संचालन मुनि श्री दिनेशकुमार जी ने किया। 

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