झूठ एवं बेईमानी से दूर रहे : आचार्य महाश्रमण


जलपाईगुडी, 2 मार्च। सिलीगुडी व गुवाहटी के मध्य राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित जलपाईगुडी जिला मुख्यालय में आज अहिंसा यात्रा  का मंगलमय  प्रवेश हुआ । अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्य श्री महाश्रमण जी अपने मुख्य प्रवचन में अहिंसा यात्रा के मुख्य तीन उद्देश्यों में से एक उद्देश्य नैतिकता के लिए आवश्यक है कि जीवन में ईमानदारी का समावेश हो, "ईमानदारी सर्वोपरी नीति है" यह बड़ा सुंदर वाक्य है। इस वाक्य का समरण करना,  श्रवण करना अच्छा है और जीवन में उतारना तो बहुत अच्छा है ।
प्रवचन पंडाल में समागत  विशाल जन समूह को संबोधित करते हुए पूज्यप्रवर ने आगे फरमाया कि आदमी की दुर्बलता ही होती है कि वह बेइमानी में चला जाता है । बेईमानी के दो आयाम है - झुठ बोलना और चोरी करना । व्यक्ति झूठ बोलने से भी विरत हो जाए और चोरी न करे यह संकल्प जग जाए तो मानना चाहिए कि जीवन में ईमानदारी आयी है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विषय वस्तु की मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति देते हुए परमश्रद्धास्पद आचार्य प्रवर ने आगे फरमाया कि कितने लोग होंगे जो अपने काम-धंधों में बेईमानी का सहारा लेते है। दुनिया में अच्छे आदमी भी है। आदमी में अच्छाइया भी मिलती है, तो कहीं कहीं कमियां भी मिलती है। हम इंसान है और सामान्य इंसान है। कमियां हो सकती है, पर कमियों को कम करने का प्रयास करे। अच्छाइयों को बढ़ाने का प्रयास करे। ईमानदारी भी जीवन का एक सदगुण होता है। किसी को धोखा देने का प्रयासआदमी न करे।छलना, वंचना आदमी को मलिन बनाने वाला होता है। सरलता आदमी में होती है तो चित्त में शुद्धता रहती है। चित शुद्धि का एक आयाम है-सरलता।
जलपाईगुड़ी के इस एक दिवसीय प्रवास में विशाल जनमेदनी को प्रेरित करते हुए अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यप्रवर ने आगे फरमाया कि आप लोग गृहस्थ है, पूर्णतया झूठ से बचने का प्रयास करे और मान
लीजिये की सही बात कहने का साहस हमारे में नहीं हो तो मौन हो जाए, कुछ भी न बोले। सही बात कहने का साहस हमारे में किसी का न हो तो झूठ बात न कहे। वहां चुप हो जाए । गीत के संगान करते हुए पूज्यप्रवर ने फरमाया-
"सत्यवादिता न सधे थांस्यु, तो रहणो चुप-चाप है।
 कपटाइ कर झूठ बोलणो, जग में मोटो पाप है"।।
आर्हत वाङ्गमय को उदधृत करते हुए पूज्य प्रवर ने फरमाया कि मृषावाद को दुनिया में सब साधुओं ने गर्हित माना है। प्राणियों के लिए अविश्वास का स्थान मृषावाद है।इसलिए मृषावाद का वर्जन करना चाहिए। जैन धर्म में अठारह पाप बताये गए है, इनमे दूसरा पाप मृषावाद है।
पूज्यप्रवर के प्रवचन के पूर्व अपने वक़्तव्य में साध्वीप्रमुखा श्री कनकप्रभाजी ने अध्यात्म की उपासना करने के विषय सारगर्भित विचार व्यक्त किये।
समणी मंजुप्रज्ञा जी ने अपनी  धरती पर पूज्यप्रवर का स्वागत किया।तेरापंथ महिला मंडल,जलपाईगुड़ी व युवती मंडल ने स्वागत गीत प्रस्तुत किये। तेरापंथी सभा के मंत्री मांगीलाल जी, अग्रसेन भवन के मंत्री प्रदीपजी सलाणी, सुरेन्द्र छाजेड़, मुमुक्षु रूपेश, अशोक गोलछा आदि ने अपने भावों की अभिव्यक्ति पूज्यप्रवर के समक्ष दी। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने किया। रिपोर्ट: कमल शर्मा, टाइपसेटिंग: उमेश बोथरा


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