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तेरापंथ इतिहास में आचार्य महाश्रमण भूटान यात्रा करने वाले प्रथम गुरु


फुलसिलिंग (भूटान).  आचार्य श्री महाश्रमण ने 13 मार्च की प्रात: जब अपनी अहिंसा यात्रा के साथ भूटान देश में प्रवेश किया तो भूटान के राजकुमार के जन्मोत्सव के माहौल में एक ऐतिहासिक कड़ी और जुड गयी. इस इतिहास के सृजन से पूर्व भारत की सीमा में संघ महानिर्देशिका साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रभा जी ने आचार्य प्रवर की इस ऐतिहासिक यात्रा के प्रति मंगलकामना करते हुए मंगलपाठ का उच्चारण किया। अपनी सभ्यता एवं संस्कृति के लिए प्रसिद्ध भूटान देश में इस प्रकार विशाल जुलूस के साथ प्रथम बार किसी धर्माचार्य का इस तरह स्वागत हुआ।

हिमालय के पहाड़ो की तलहटी पर बसे हुए फुलसिलिंग शहर में उतार-चढाव के मार्गो से होते हुए आचार्य श्री ने 'पेल्डन ताशी चोलिंग शेद्रा "बौद्धमठ में प्रवेश किया। बौद्ध भिक्षुओं ने मंत्रोच्चार के साथ तथा अपने पारम्परिक वाद्ययंत्र के मधुर ध्वनि से चिंहु और मंगलमय वातावरण बनाते हुए पूज्यप्रवर का भव्य स्वागत किया।



"बौद्धमठ के मध्य के स्थित टाँसी गुम्पा के बाह्य परिसर में उमड़े भूटानी नागरिको को संबोधित करते हुए शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण ने फरमाया कि अहिंसा यात्रा के अंतर्गत आज हम भूटान आये है और यह बौद्ध धर्म से जुड़ा परिसर है । जहाँ एक ओर हमारे जैन मुनि साध्वियां विराजमान है, वही दुसरी ओर बौद्ध धर्म से जुड़े लोग विराजमान है। हम साधना के क्षेत्र में, अध्यात्म के क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रयास करे। भूटान की जनता भी अध्यात्म से युक्त रहे, शान्ति से युक्त रहे। हमारी भूटान की जनता के प्रति मंगलकामना है। इस मंगलमय अवसर पर शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमणजी ने भूटान की जनता की शान्ति के लिए उवसग्गहर-स्तोत्र व विघ्न-हरण की पाठ का उच्चारण किया।"

"ज्ञातव्य है कि कुछ समय पूर्व ही भूटान के राजा जिम्मे खेसर नांगे वांगयुक राजकुमार का जन्म हुआ है। इस देश में लोकतंत्र स्थापित होने के बावजूद आज भी व्यवस्थाओं में राजतंत्र प्रभावी है।  जनता में राजा के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव भी है। राजकुमार के जन्म से यहाँ विशेष उत्सव का माहौल है, इसी प्रसंग का उल्लेख करते हुए द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव के ज्ञाता परमश्रद्धेय आचार्यप्रवर ने प्रवचन में फरमाया कि-भूटान के बारे में जानकारी मिली की यहाँ राजकुमार प्राप्त हुआ है। यह तो सृष्टि की रचना है। देश को चलाने के लिए शासक की भी अपेक्षा होती है, राजकुमार की प्राप्ति हुई है,हमारी मंगलकामना है कि  भूटान में शान्ति रहे और राजकुमार भी आध्यात्मिकता से संयुक्त व्यक्तित्व वाला बने। उनमे भी अध्यात्म के, अहिंसा, संयम व तप के संस्कार पुष्ट हो और कार्य में शान्ति रखने वाले, पवित्र जीवन जीने वाले और भूटान का कल्याण करने वाले राजकुमार बने-यह हमारी उनके प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना है।"

श्रमण-परम्परा की दो धाराओं- जैन व बौद्ध के अध्यतामिक मिलन के इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधान अध्यापक लेकीलामा ने अंग्रेजी भाषा में भावों की अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम के शुभारम्भ में बौद्ध धर्म के अनुसार सभी भिक्षुओं ने सामूहिक रूप से लगभग 15 मिनिट तक स्वागत पाठ का उच्चारण किया।

"भूटान में प्रेम व भाईचारे का भाव:-महाश्रमणी साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रभा जी ने अपने उद् बोधन में कहा कि शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमणजी आज भूटान की धरती पर पधारे है। भूटान ऐसा देश है जो हिमालय की पर्वतमाला पर स्थित है। यहाँ अनेक देशो के लोग प्रेम और भाईचारे के साथ रह रहे है और जैसा बताया गया कि भारत के साथ तो इसका अभिन्न सम्बन्ध है। एक देश से दूसरे देश में प्रवेश हो और पासपोर्ट की जरुरत नही हो, यह बहुत कठिन है लेकिन जैसा की हमने सुना है जयगांव से फुलसिलिंग आये तो कोई पासपोर्ट की जरुरत नही रही, न कोई प्रतिबन्ध है। स्वतंत्रता से लोग आते-जाते है। यह भारत और भूटान के मैत्री व अभिन्नता का प्रतीक है। "
इस अवसर पर अहिंसा यात्रा के प्रवक्ता मुनि श्री कुमार श्रमण जी ने अहिंसा यात्रा के उद्देश्य एवं लक्ष्य पर विस्तार से बताते हुए कहा कि भूटान में विकास दर का आधार अर्थ न होकर जनता की ख़ुशी पर निर्भर है।
भारतीय दूतावास के काउंसलेट जनरल पियूष गुप्ता ने अपने व्यक्तव्य में आचार्य श्री का स्वागत किया।

कार्यक्रम स्थल में पूर्व प्रधानमंत्री, भूटान मंत्री सांगे लाडो, पेम्बा वांगचुक, लेकी लामा आदि अनेक महानुभाव उपस्थित थे। उपस्थित सभी महानुभाव का स्वागत एवं सन्मान श्री जैन शेवताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष श्री किशनलाल जी डागलिया ने किया।  कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने किया।

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