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अहंकार, गुस्सा, प्रमाद और रुग्णता ज्ञानप्राप्ति में बाधक

बरपेटा रोड. तेरापंथ धर्मसंघ के एकादश्म अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने प्रातःकालीन उद्बोधन में फरमाया कि- पाॅच ऐसे कारण है जिनसे आदमी शिक्षा को प्राप्त नही होता है। शिक्षा प्राप्त करने इच्छुक व्यक्ति उन पाॅच कारणो से दूर रहना चाहिए। उन पाॅच कारणो में पहला कारण है-अहंकार जिसे मृदुता से जीतना चाहिए। अध्यात्म की साघना की दष्टि से और व्यवहार की दष्टि से भी अहंकार आदमी का शत्रु होता है। वर्तमान मनुष्य जीवन में भी बड़ा कहलाने वाला आदमी कभी छोटा बन जाता है। दुसरो पर हुक्म चलाने वाले को कभी दुसरो के हुक्म में रहना पड़ता है। मनुष्य को धन का भी घमण्ड नही करना चाहिए। धन के प्रति ज्यादा आसक्ति-मोह भी नही करना चाहिए। धन का दुरूपयोग भी नही करना चाहिए। ज्ञान का, रूप का, तपस्या का भी घमण्ड नहीं करना चाहिए। जो विद्यार्थी अपने से विनय पुर्वक ज्ञान लेता है उसका ज्ञान अघिक फलवान हो सकता है। विद्या का आदमी सम्मान करें। शिक्षक गुरू है उनके प्रति भी विनय का भाव रखना चाहिए। हमे अपने जीवन में अहंकार से बचने का प्रयास करना चाहिए। 

दुसरी बाधा है- गुस्सा. गुस्सा ज्ञान प्राप्ति में बाधक तत्व होता है। तीसरी बाधा है- प्रमाद, विघार्थी को प्रमाद में नही जाना चाहिए। चोथी बाधा है -रोग, शरीर रुग्ण नही होता है तो मन भी स्वस्थ रहता हैं और व्यक्ति ज्ञान प्राप्ति में सफल हो सकता है। पांचवी बाधा है आलस्य विद्यार्थी को आलस्य नहीं करना चाहिए। आलस्य मनुष्य का ऐसा शत्रु होता है जो मनुष्य के भीतर रहता हुआ नुकसान करता है। परिश्रम से बड़ा कोई साथी नहीं होता। विद्यार्थियों को परीक्षा को पास करने के लिए कभी नकल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कठिन परिश्रम से ही व्यक्ति महानता को प्राप्त कर सकता है।

इस अवसर पर शिक्षकगण, विद्यार्थी और सभी ग्रामवासियों ने अहिंसा यात्रा के तीन उद्देश्यों पर आधारित सद्भावना, नैतिकता, नशामुक्ति के संकल्प ग्रहण किए।

पूज्य प्रवर के स्वागत में तेरापंथी सभा के मंत्री अनिल बैगानी, कुसूम बोथरा कन्हेयालाल भन्साली शंकरदेय शिशु निकेतन स्कुल के शिक्षक सुखमार सरकार ने अपने भावाभिव्यक्ति दी। ममता दुद्येडिया ने गीतिका की प्रस्तुति दी। संचालन मुनि श्री दिनेशकुमारजी ने किया।







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