तेरापंथी महासभा से बड़ी कोई संस्था नहीं: आचार्यश्री महाश्रमण

धर्मसंघ की मातृ संस्था तेरापंथी महासभा का वार्षिक सम्मेलन का हुआ शुभारम्भ
त्रिदिवसीय सम्मेलन में भाग लेने देश भर के पदाधिकारी व सदस्यगण पहुंचे श्रीचरणों में
आचार्यश्री ने चार ‘एम’ तो साध्वीप्रमुखाजी ने तीन ‘ए’ का दिया मंत्र
05.08.2016 धारापुर. तेरापंथी महासभा के त्रिदिवसीय वार्षिक सम्मेलन का शुभारम्भ शुक्रवार को आचार्यश्री के मंगल महामंत्र के साथ हुआ. इसमें देश भर से सभाओं के अधिकारी उपस्थित हुए थे. आचार्यश्री ने इसे धार्मिक/सामाजिक संस्था बताया और सेवा, ईमानदारी व निष्ठा के साथ निरंतर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के लिए चार ‘एम’  मैन पावर, मनी पावर, मैनेजमेंट पावर व मोरालिटी पावर का मंत्र प्रदान किया तो साध्वीप्रमुखाजी तीन ‘ए’ एक्सेप्ट, एडजेस्ट व एप्रिसीएट का मंत्र प्रदान कर धार्मिक व सामाजिक सेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ने की अवगति प्रदान की. वहीं धर्मसंघ के दो नए कल्पवृक्ष मुख्य मुनि मुनिश्री महावीरकुमारजी व साध्वीवर्या साध्वीश्री संबुद्धयशाजी ने भी पाथेय प्रदान किया. 
103 वर्षों से निरंतर सेवा में तत्पर है तेरापंथी महासभा
28 अक्टूबर 1913 को तेरापंथी सभा के नाम से आरंभ हुई संस्था 30 जनवरी 1947 में तेरापंथ धर्मसंघ में तेरापंथी महासभा के नाम से प्रख्यात हुई जो वर्तमान समय में एक वटवृक्ष का रूप धारण कर चुकी है और अपनी छांव में सकल तेरापंथी समाज की सेवा, और उनके धार्मिक व सामाजिक गतिविधियों को पल्लवित-पुष्पीत कर रही है। धर्मसंघ में सभी संस्थाओं की मातृसंस्था का दायित्व निभाने वाली तेरापंथी महासभा वर्तमान समय में धर्मसंघ की सर्वोच्च संस्था है, जो आचार्यों के निर्देशन में समाज को धार्मिक व सामाजिक दृष्टि से उन्नत बनाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है।
आचार्यश्री द्वारा मंत्रोच्चार के उपरान्त सर्वप्रथम मुख्यमुनिजी का हुआ उद्बोधन
आचार्यश्री के मंत्रोच्चार के उपरान्त पूज्यप्रवर का आशीष प्राप्त कर धर्मसंघ में नए कल्पतरू और भविष्य के संभावित कल्पवृक्ष मुख्यमुनि मुनिश्री महावीरकुमारजी ने महासभा को प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ एक आचार्यनिष्ठ धर्मसंघ है। यह इसकी विशेषता है। यहां आचार व विचार एक हैं। इस प्रतिनिधि सम्मेलन में प्रबुद्ध लोग आए हैं। उन सभी में श्रावकत्व का विकास होना चाहिए। अध्यक्ष, मंत्री या कोई पदाधिकारी बाद में पहले वह श्रावक है। इसलिए उसे विकारों से मुक्त समाज की स्थापना का प्रयास करना चाहिए। विकारमुक्त और विकासयुक्त समाज की स्थापना कर उसे आगे बढ़ाने की सोच रखनी चाहिए। समाज को यदि विकास के पथ ले जाना है तो साकारात्मक सोच रखनी चाहिए।
महासभा के मुख्य न्यासी और अध्यक्ष ने लोगों को दी जानकारी
कार्यक्रम में उपस्थित समस्त पदाधिकारियों व सदस्यों का इस सम्मेलन में स्वागत करते हुए जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा के प्रधान न्यासी श्री हंसराज बेताला ने कहा कि महासभा का विकास आप सभी का विकास है। यह संगठन आचार्यश्री के इंगितानुसार समाज को वर्धापित करने का प्रयास करता है। आचार्यश्री जो मानवता का संदेश लेकर चले हैं उसे देश भर में स्थापित सभाएं एक योजना बनाकर जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए। वर्तमान अध्यक्ष श्री किशनलाल डागलिया के साथ किए जा रहे कार्यों का अनुभव भी लोगों के समक्ष रखा और अधिक उत्साह से संगठन को मजबूत करने का लोगों से आह्वान किया। महासभा के वर्तमान अध्यक्ष श्री किशनलाल डागलिया ने आचार्यश्री के सम्मुख अपने विचारों की अभिव्यक्ति देते हुए कहा कि महासभा को आचार्यश्री ने मातृ संस्था का दर्जा दिया है तो मां का कितना बड़ा दायित्व होता है। कहा कि अभी तक मैंने अपने छोटे कार्यकाल में अब तक 221 संगठनों की यात्राएं की हैं। वहां से प्राप्त जानकारियां, समस्याएं और सुझाव आपके श्रीचरणों में यथासंभव पहुंचाने का प्रयास किया। 
किसी भी संगठन का कोई न कोई मुख्य उद्देश्य होता है। मेरे इस संगठन का मुख्य उद्देश्य गुरु दृष्टि की आराधना करना है। गुरु दृष्टि जब जैसी होगी यह संगठन हमेशा उस दृष्टि की आराधना करने को तत्पर रहेगा। ज्ञानशाला और उपासक श्रेणी को आचार्यश्री के हृदय के निकट की संस्था बताते हुए उन्होंने कहा कि इन्हें बढ़ाने का हमने प्रयास किया है। अब तक देश भर में कुल 413 ज्ञानशाला के केन्द्रों में बच्चे संस्कार की शिक्षा ले रहे हैं। हमारी उपासक श्रेणी भी लोगों को धर्मयुक्त बनाने की दिशा में अच्छा प्रयास कर रही है। इन्हें और आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। तेरापंथ कार्ड और संपोषण जैसे दो नए आयामों के लिए आचार्यश्री से आशीर्वाद मांगा।
आचार्यश्री ने चार ‘एम’ का दिया फार्मूला
पूज्यप्रवर ने अपने मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं को शाश्वत आत्मा की निरंतर रक्षा करने का ज्ञान प्रदान किया। वहीं जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा के वार्षिक सम्मेलन के प्रथम दिन अपनी आशीष वृष्टि करते हुए कहा कि तेरापंथी महासभा इस समाज की एक सक्षम संस्था है। वैसे तो समाज में अनेक छोटी-बड़ी संस्थाएं हैं, किन्तु तेरापंथी महासभा से बड़ी कोई संस्था नहीं है। यह धर्मसंघ की सर्वोच्च संस्था है। आचार्यश्री ने इस संस्था के लिए चार ‘एम’ का फार्मूला प्रदान करते हुए कहा कि मैन पावर, मनी पावर, मैनेजमेंट पावर और मोराइलिटी पावर हो तो संस्था अच्छा विकास कर सकती है। उन्हें और अधिक व्याख्यायित करते हुए पूज्यप्रवर ने कहा कि मैन पावर अर्थात संगठन में सदस्यों की अधिक से अधिक संख्या होनी चाहिए जो विभिन्न गतिविधियों को पूर्ण करने में सहायक साबित हो सकते हैं। कोई संस्था है तो उसके भरण-पोषण व सुचारू रूप से चलाने के लिए मनी पावर की आवश्यकता भी पड़ती होगी। इसलिए मनी पावर भी होना आवश्यक है। उसी प्रकार आदमी हों, पैसा हो और उसे व्यवस्थित ढंग से खर्च या उनका सदुपयोग करने की व्यवस्था न हो तो संगठन के विकास में बाधा उत्पन्न हो सकता है। इसलिए अच्छे व्यवस्थापक का होना भी आवश्यक है। आचार्यश्री ने मोराइलिटी अर्थात सद्भावना को भी किसी संगठन की मजबूती का महत्त्वपूर्ण अंग बताया और इसे संगठन मजबूती का आधार स्तंभ बताया। आचार्यश्री देश भर के सभा के अध्यक्षों को एक बार अपने स्थान पर खड़ा कराया और उन्हें आशीष प्रदान करते हुए कहा कि ऐसी संस्था का अध्यक्ष बनना जीवन का महत्त्वपूर्ण क्षण है। सभी में धार्मिकता की भावना पुष्ट होनी चाहिए। साथ ही आचार्यश्री ने भी अध्यक्षों को एक साल तक शनिवार को सामायिक करने का संकल्प कराया। संगठन के कार्यों में ईमानदारी व प्रमाणिकता बनाए रखने के साथ ही सभा के पदाधिकारी व कर्मचारियों में संघ और उसके नियमों के प्रति निर्मल भाव पुष्ट होने की मंगलकामना की। साध्वीवर्या साध्वश्री संबुद्धयशाजी ने एक गीतिका के माध्यम से अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी।
साध्वीप्रमुखाजी ने दिया तीन ‘ए’ का अवदान
महाश्रमणी साध्वीप्रमुखाजी का आशीर्वाद लेने पहुंचे महासभा के पदाधिकारियों, कर्मचारियों व सम्मेलन में भाग लेने आए लोगों को अपना आशीष प्रदान किया और तीन ‘ए’ एक्सेप्ट, ऐडजेस्ट व एप्रीसिऐट का मंत्र प्रदान करते हुए कहा कि सबकी आस्था के केन्द्र आचार्यश्री की सन्निधि है तो उनकी सन्निधि में आरंभ हुए इस वार्षिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से आए लोग यात्रा की थकान के बावजूद भी उत्साहित हैं। सबसे पुराने संगठन के रूप में महासभा विभिन्न धार्मिक व सामाजिक कार्यों को आयाम दे रही है। संगठन को आगे बढ़ाने के लिए हर एक कार्यकर्ता को सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। सोच यदि सकारात्मक होगी तो संगठन का कार्य उचित दिशा में आगे बढ़ सकता है। साध्वीप्रमुखाजी ने सकारात्मक सोच को सफलता का मेरूदण्ड बताया और संगठन को चलाने के तीन ‘ए’ एक्सेप्ट अर्थात स्वीकार करना, एडजेस्ट अर्थात व्यवस्थित करना, या समायोजित करना व एप्रीसिएट अपनी टीम की प्रशंसा करना या उनके कार्यों को संबल प्रदान करने के लिए उत्प्रेरित करने का मंत्र प्रदान किया। आचार्यश्री के नशामुक्ती के अभियान से सभी को जुड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि हर सदस्य अपने घर को नशामुक्त करने का प्रयास करे तो आचार्यश्री के नशामुक्ति अभियान को गति मिल सकती है।
कार्यक्रम का संचालन जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा के महामंत्री श्री प्रफुल्ल बेताला ने किया।

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