आदमी को जीवों को अभयदान देना चाहिए - आचार्य श्री महाश्रमण जी

          16.12.2016 बड़ा बाजार, ग्वालपाड़ा असम राज्य के कामरूप जिले के गड़ल, धारापुर में चार महीने प्रवास संपन्न कर अहिंसा यात्रा मेघालय की यात्रा कर लौटी तो वापस कामरूप जिले के ही प्रवेश किया और कामरूप जिले के गांवों को ही पावन करने के उपरान्त अहिंसा यात्रा शुक्रवार को अपने प्रणेता, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के साथ ग्वालपाड़ा जिला मुख्यालय में मंगल पदार्पण किया। चतुर्मास के बाद आचार्यश्री के ज्योतिचरण से पावन होने वाला ग्वालपाड़ा असम राज्य का पहला जिला बना। यहां आचार्यश्री का भव्य स्वागत जुलूस के साथ श्रद्धालुओं ने स्वागत-अभिनन्दन किया। धवल सेना के साथ दो दिवसीय प्रवास के लिए आचार्यश्री ने बड़ा बाजार स्थित तेरापंथ भवन में मंगल प्रवेश किया। भवन परिसर में बने वीर भिक्षु समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने अपनी अमृतवाणी से अभिसिंचन प्रदान किया। साथ ही असाधारण साध्वीप्रमुखाजी, मुख्यनियोजिकाजी और मुख्यमुनिश्री ने भी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान की। अपने अराध्य को अपनी धरा पाकर उल्लासित श्रद्धालुओं ने भी आचार्यश्री के चरणों में अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति देकर आशीष प्राप्त किया।
शुक्रवार की सुबह आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ हेलापाकरी से विहार किया। आज का विहार लगभग छह किलोमीटर का था। आचार्यश्री के नगर में पहुंचने से पहले ही श्रद्धालु अपनी धरा पर अपने आराध्य देव के प्रथम पदार्पण के स्वागत के लिए अपनी पूरी तैयारी कर रखी थी। जैसे ही आचार्यश्री ही अपनी धवल सेना के साथ नगर की सीमा में प्रवेश किया, वैसे ही वहां उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री का भाव भरा अभिनन्दन किया। साथ ही ग्वालपाड़ा की तेरापंथी सभा, युवक परिषद, महिला मंडल, कन्या मंडल के सदस्य-सदस्याएं गणवेश में पंक्तिबद्ध होकर जुलूस को विशाल स्वरूप प्रदान कर रहे थे। इन सब के बीच ज्ञानशाला के ज्ञानार्थी बच्चों का उत्साह भी अपने चरम था, वे भी अपने सज-धज कर अपने आराध्य देव के स्वागत को उपस्थित थे। इसके अलावा स्कूली बच्चे और अन्य जैनेतर समाज भी महासंत के दर्शन को उपस्थित थे। विशाल जुलूस के गगनभेदी जयकारों के साथ आचार्यश्री तेरापंथ भवन पधारे।
भवन परिसर में ही बने वीर भिक्षु समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि मानव जीवन अधु्रव है। मानव जीवन शाश्वत नहीं है। इसलिए आदमी को क्षण मात्र भी प्रमाद नहीं करना चाहिए। अपने समय का सम्यक् नियोजन करने का प्रयास करना चाहिए। कुश के अग्र भाग पर अटकी ओस की बूंद की भांति मनुष्य का जीवन होता है जो कुछ समय पश्चात समाप्त होने वाला है। मनुष्य का जीवन दुर्लभ होता है। इसके माध्यम से आदमी चाहे तो साधना कर मोक्ष को प्राप्त कर सकता है और चाहे तो घोर पाप कर सातवें नरक में भी जा सकता है।
आचार्यश्री ने मानव जीवन रूपी वृक्ष के छह फल का वर्णन करते हुए कहा कि मानव जीवन रूपी वृक्ष का पहला फल गुरु की आज्ञा का सम्मान है। गुरु की आज्ञा विचार करने के लिए नहीं होती है। इसका दूसरा फल गुरु की पर्युपासना है। आदमी कोशिश करे कि गुरु की सन्निधि में रहकर उनकी उपासना हो सके। मानव जीवन रूपी वृक्ष का तीसरा फल अनुकंपा है। आदमी को जीवों को अभयदान देना चाहिए। किसी भी प्रकार के जीव या प्राणी की कष्ट नहीं देना चाहिए। सबके प्रति हृदय में दया-अनुकंपा का भाव होना चाहिए। चैथा फल शुद्ध साधु को दान देना बताया गया है। पांचवा फल दूसरों के गुणों महत्त्व देना। इस मानव जीवन रूपी वृक्ष का छठा फल है आगम वाणी का श्रवण या अध्ययन करना। गुरु मुख से आगम वाणी का श्रवण बहुत अच्छा हो सकता है। आदमी गुरु की वाणी सुनकर उससे अपने जीवन को सार्थक और सुफल बनाने का प्रयास करे।
आचार्यश्री के आह्वान पर ग्वालपाड़ावासियों ने सहर्ष अहिंसा यात्रा के तीनों संकल्पों यथा सद्भावपूर्ण व्यवहार करने, यथासंभव ईमानदारी का पालन करने व पूर्णतया नशामुक्त जीवन जीने का संकल्प स्वीकारप किया। आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को विशेष प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि जिन श्रद्धालुओं ने अभी तक सम्यक्त्व दीक्षा (गुरुधारणा) स्वीकार नहीं की है, उन्हें कल सम्यक्त्व दीक्षा प्रदान करने का भाव है। गुरु की इस अनुकंपा से श्रद्धालुओं के ‘ओम अर्हम्’ के नाद से पूरा वातावरण गूंज उठा।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन में पदार्पण से पूर्व असाधारण साध्वीप्रमुखाजी, मुख्यनियोजिकाजी ने भी अपनी ममतामयी वाणी से श्रद्धालुओं को अभिसिंचन प्रदान किया। वहीं आचार्यश्री के आगमन के उपरान्त मुख्यमुनिश्री ने गुरु की शतत् वन्दना करने की प्रेरणा प्रदान की और साथ ही ‘तेरी जय-जय-जय हो’ गीत का सुमधुर स्वर में संगान कर श्रद्धालुओं के अंतःकरण को पुनीत बनाने का प्रयास किया।
कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने अपनी भावनाओं को आचार्यश्री के चरणों में समर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस क्रम में स्वागताध्यक्ष श्री बाबूलाल छाजेड़, तेरापंथी सभा ग्वालपाड़ा के अध्यक्ष श्री मूलचंद कोठारी, तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष श्री प्रमोद सुराणा व तेरापंथ महिला मंडल की अध्यक्ष श्रीमती सरोज सुराणा ने अपनी भावांजलि आचार्यश्री के चरणों में समर्पित की। कन्या मंडल, महिला मंडल, तेरापंथी सभा, तेरापंथ युवक परिषद के सदस्य-सदस्याओं ने गीत के माध्यम से अपनी भावनाओं की प्रस्तुति दी। वहीं ज्ञानाशाला के ज्ञानार्थियों ने भाव नृत्य की प्रस्तुति देकर अपनी धरा पर अपने आराध्य देव का मंगल स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन तेरापंथी सभा के मंत्री श्री प्रमोद सुराणा ने किया। 

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