"गलत कार्य करने वाला भयभीत होता है" - आचार्यश्री महाश्रमण

-त्रिदिवसीय प्रवास हेतु अहिंसा यात्रा व धवल सेना के साथ धुबड़ी की धरा पर  पूज्य प्रवर का एतिहासिक मंगल पदार्पण--आचार्यश्री ने आत्मा की रक्षा करने का दिया ज्ञान-

आचार्यश्री महाश्रमणजी

          29 दिसंबर, धुबड़ी (असम) : बांग्लादेश की सीमा से पूर्वी ओर लगभग 690 किलोमीटर स्वाक्यर क्षेत्रफल का यह धुबड़ी जिला चावल, पटसन, मछली तथा अन्य उत्पादों के व्यापार का केन्द्र है। किसी जमाने में यहां माचिस का कारखाना भी चलता था जो समय की मार के कारण बंद हो चुका है। पद्म पुराण में वर्णित बिहुला-लखिन्दर से जुड़ा यह जिला मुख्यालय ब्रह्मपुत्र महानदी के किनारे बसा हुआ है। यहां स्थित धुबनीर घाट के नाम पर इस जिले का धुबड़ी नाम पड़ा। यहां कभी सिक्खों के गुरु तेगबहादुरजी का पदार्पण हुआ था। उसके बाद शायद पहली बार इस धरा पर किसी महासंत के रूप में आचार्यश्री महाश्रमणजी का पदार्पण हो रहा था जो वैश्विक शांति के लिए मानवता को जागृत करने हजारों किलोमीटर की पदयात्रा कर यहां पहुंच रहे थे। आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ जैसे ही नगर की सीमा पर पहुंचे तेरापंथी सभा के सभी संगठनों के सदस्य, सदस्याएं अपने गणवेश में अपने आराध्य के स्वागत को खड़े थे। वहीं अनेक धर्म संप्रदाय के लोग भी ऐसे महासंत के दर्शन को पंक्तिबद्ध खड़े थे। आचार्यश्री के नगर सीमा में प्रवेश करते हुए श्रद्धालुओं ने विभिन्न जयघोष के माध्यम से पूरे वातावरण को गुंजायमान कर दिया। आचार्यश्री के मुख की मोहक मुस्कान व आशीषवृष्टि को उठे हाथ लोगों को नतसिर बना रहे थे। विशाल और सुसज्जीत जुलूस के साथ आचार्यश्री नगर स्थित शंकरदेव शिशु उद्यान (चिल्ड्रेन पार्क) पहुंचे।
          उद्यान परिसर में बने विशाल प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि आदमी को आत्मा की सतत रक्षा करने का प्रयास करना चाहिए। सुरक्षित आत्मा ही सभी दुःखों से मुक्त हो सकती है और मोक्ष प्राप्त कर सकती है। आत्मा चेतना के रूप में शरीर में विद्यमान है तो शरीर का महत्त्व है। आदमी को संयम की साधना कर अपनी आत्मा को सुरक्षित रखने का प्रयास करना चाहिए।

          आचार्यश्री ने चिंता और चिता का अंतर बताते हुए कहा कि चिता निर्जीव को जलाती है और चिंता सजीव को जला देती है। इसलिए आदमी को चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। व्यथा नहीं, व्यवस्था करने का प्रयास करना चाहिए।
          आचार्यश्री ने नैतिकतापूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देते हुए कहा कि जिस आदमी के जीवन में नैतिकता और धर्म है, वह चिंता से मुक्त रह सकता है। क्योंकि गलत कार्य करने वाला भयभीत होता है जबकि जागरूक और अप्रमत्त व्यक्ति सुखी हो जाता है। आचार्यश्री ने धुबड़ी पहुंचने पर अपनी विशेष संबोधन प्रदान करते हुए कहा कि आज हम धुबड़ी में आए हैं। अब असम से विदाई लेने का समय आ रहा है। महीनों तक असम की सीमा में भ्रमण किया, चतुर्मास किया। अब अंतिम समय आ रहा है, अब बंगाल की सीमा में प्रवेश करने वाले हैं। आज विहार के दौरान रास्ते में कुछ लोग मिले जिन्हें याज्जीवन गुटखा न खाने का संकल्प कराया। आचार्यश्री ने कहा कि साधु को न तो नोट चाहिए, न वोट चाहिए और न ही सर्दी के कारण कोट चाहिए। हम साधुओं को तो बस आप सभी की खोट चाहिए। आप खोट हमें देकर अपने जीवन को अच्छा और शांतिमय बनाने का प्रयास करें। जीवन में नैतिकता रखने का प्रयास करना चाहिए। नैतिकता एक ऐसी गंगा है, जिसमें अभिस्नात होकर खुद को पवित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को यथार्थ की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने अहिंसा यात्रा के तीन महान उद्देश्यों को बताते हुए कहा कि आदमी के जीवन में सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की भावना प्रगाढ़ हो जीवन अच्छा बन सकता है।
          आचार्यश्री ने अपने मंगल प्रवचन के दौरान अहिंसा यात्रा के तीन उद्देश्यों के संकल्पों का वर्णन किया और लोगों को इसे स्वीकार करने का आह्वान किया तो आचार्यश्री के दर्शन को पहुंचे सिक्ख समुदाय के लोगों ने संकल्पों को एक बार पुनः उच्चारित करने का अनुरोध किया। इस आचार्यश्री ने तीनों संकल्पों को पुनः बताया। संकल्प समझ में आते ही उपस्थित जिलाधिकारी सहित सिक्ख समुदाय और हजारों श्रद्धालुओं ने अहिंसा यात्रा के संकल्पत्रयी को स्वीकार कर अपने आपको अहिंसा यात्रा का भागीदार बनाया।
          आचार्यश्री के मंगल प्रवचन और संकल्पत्रयी के स्वीकरण के उपरान्त धुबड़ी से संबंधित साध्वी विभाश्रीजी ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। इसके उपरान्त जिलाधिकारी श्री धीराज चौधरी ने असमी भाषा में आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त आचार्यश्री से आशीष प्राप्त कर विदा हुए। आचार्यश्री महाश्रमण प्रवास व्यवस्था समिति धुबड़ी के अध्यक्ष श्री पन्नालाल बरड़िया और उपासक श्री कमलचन्द बैद ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावांजलि अर्पित की। तेरापंथ महिला मंडल, कन्या मंडल और युवक परिषद के सदस्य/सदस्याओं ने पृथक-पृथक गीत का संगान कर आराध्यदेव का स्वागत किया। वहीं कन्याओं ने आचार्यश्री के समक्ष सामायिक करने का संकल्पपत्र भेंट किया तो आचार्यश्री ने भी उन्हें आशीर्वाद स्वरूप एक साल तक सामायिक करने का त्याग करवाया। सिक्ख प्रतिनिधि बोर्ड के सरदार श्री गुरुमेल सिंह ने आचार्यश्री का स्वागत करते हुए कहा कि मैं किस्मत वाला जो मुझे ऐसे महापुरुष का दर्शन प्राप्त हुआ। मैं अत्यंत भाग्यशाली हूं जो आपके चरणों की धूल अपने मस्तक पर लगाने यहां उपस्थित हुआ हूं। मैं बोर्ड की ओर से कोटि-कोटि स्वागत अभिनन्दन करता हूं। उन्होंने आचार्यश्री को गंगा की उपाधि देते हुए कहा कि धुबड़ीवासियों को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए।
             मैं आपसे यहीं अरदास करता हूं कि आपके आशीर्वाद से धुबड़ी में शांति और सौहार्द बना रहे।
          धुबड़ी नगर की चेयर पर्सन श्रीमती टोमादास ने आचार्यश्री की अभ्यर्थना करते हुए कहा कि आपश्री के चरणरज पाकर यह शहर पवित्र हो गया है। मैं पूरे शहर की ओर से अपका हार्दिक स्वागत करती हूं। आज धुबड़ी में उत्सव जैसा माहौल है। मैं सौभाग्यशाली हूं जिसे आपश्री के दर्शन करने और स्वागत करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। मुझे खुशी है कि हमारे नगर में आज चारों तरफ खुशहाली छाई हुई है। आपके यह आगमन की तरीख ऐतिहासिक बन गई है। आपकी वाणी हम सभी के जीवनशैली के लिए लाभदायक है। लोगों में बढ़ती हिंसा की भावना को समाप्त करने को ही महाराजजी का यहां आगमन हुआ है। आज दो-दो सूर्य का उदय हुआ है जो धुबड़ीवासियों को प्रेरणा देने वाला है।
          भोजपुरी समाज के श्री परशुराम दूबे ने संपूर्ण विश्व का गुरु बताते हुए कहा कि धुबड़ी में एक ऐसे महान गुरुजी का आगमन हुआ है जो केवल जैन समाज के नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व के गुरुजी हैं। मैं आपके चरणों की वन्दना करता हूं। उन्होंने कहा कि इस कलियुग में हम सभी अपने बच्चों को डाक्टर, इंजिनियर बनाने के चक्कर में इंसान बनाना भूल गए हैं। आचार्यश्री लोगों को इंसान बनाने का संदेश लेकर आए हैं। जो भी गुरुजी की वाणी को सुनेगा वह अवश्य अच्छा इंसान बन जाएगा। इसलिए ऐसा प्रयास करना चाहिए कि हम सभी अपने साथ अपने बच्चों को भी गुरुजी के चरणों में लाएं और उन्हें डाक्टर, इंजिनियर बनाने से पहले इंसान बनाएं। अग्रवाल समाज की ओर श्री दिनेश धनावत ने सिर्फ भारत देश ही संपूर्ण विश्व के मानव जाति के कल्याण को आधार बना अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं का परित्याग कर लोगों को प्रेरणा देने के लिए हजारों किलोमीटर की पदयात्रा करने वाले महासंतजी के चरणों में मैं प्रणाम करता हूं। मैं सौभाग्यशाली हूं जो ऐसे ऐतिहासिक क्षणों का साक्षी बनने का सुअवसर मिला। पता नहीं अब कब इतने बड़े संत का धुबड़ी में आगमन हो पाए। इस आगमन को हमेशा अपनी यादाश्त में बनाए रखने के लिए मैं नगर के चेयर पर्सन से यह निवेदन करूंगा कि इस पार्क का नाम चिल्ड्रेन पार्क से बदलकर आचार्यश्री महाश्रमण पार्क किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी को भी आचार्यश्री के यहां आगमन से प्रेरणा मिलती रहेगी। साधुमार्गी जैन श्रावक संघ के श्री जौहरीमल सुराणा ने आचार्यश्री से निवेदन करते हुए कहा कि भारत के इस पूर्वोत्तर राज्य पर अपनी कृपा बनाए रखने के लिए साधु-साध्वियों का समणियों भेज हम सभी को लाभान्वित करते रहें। धुबड़ी ब्राह्मण समाज के श्री सुरेश शर्मा ने कहा कि धुबड़ी की धरा पर एक साथ इतने संतों के आगमन से यहां का कण-कण पावन हो गया है। आपश्री के मंगलवाणी से हम सभी का अवश्य हृदय परिवर्तन होगा और आपकी वाणी लोगों को जीवन भर कल्याण करती रहेगी। दिगम्बर जैन समाज के श्री पवन झांझरी ने आचार्यश्री के त्याग, तपस्या, संयममय जीवन को स्वर्ण अक्षरों में लिखने को कम बताते हुए कहा कि आप जैसे गुरु की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। आपकी वाणी से सभी लोग प्रेरणा लेकर जीयो और जीने दो का संकल्प लेकर चलेंगे। इसके अलावा टीपीएफ के डाक्टर बीएस बैद और तेरापंथी सभा धुबड़ी के अध्यक्ष श्री अनूपचन्द सेठिया ने भी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी और आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।




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