विनय आए विद्यार्थी में : आचार्यश्री महाश्रमणजी

-शंकरदेव विद्या निकेतन के विद्यार्थियों ने सांस्कृतिक तरीके से किया भव्य स्वागत

-आचार्यश्री ने विद्यार्थियों को विनय के साथ विद्या ग्रहण करने का दिया संदेश


आचार्यश्री महाश्रमणजी

       04.12.2016 हेंगरीबाड़ी, गुवाहाटी (असम): 18 दिनों तक मेघालय की धरा पर आध्यात्मिक ज्ञान का ज्योति जगाकर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अनुशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के ज्योतिचरण का रविवार को एक बार पुनः गुवाहाटी की धरा पर मंगल पदार्पण हुआ, लेकिन इस बार गुवाहाटी का हेंगरीबाड़ी क्षेत्र पूज्यचरणों के स्पर्श से पावन हुआ। आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ हेंगरीबाड़ी स्थित शंकरदेव विद्या निकेतन विद्यालय में पधारे। जहां विद्या भारती संस्था और असम शिशु शिक्षा समिति के जनरल सेक्रेट्री श्री सदादत्त, विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री तपन शर्मा, विद्यालय के समस्त शिक्षक-शिक्षका और विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने आचार्यश्री व धवल सेना का भव्य स्वागत किया। 
बर्नीहाट से प्रातः की मंगलबेला में आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ पुनः गुवाहाटी की रास्ते पर विहार किया। एक तरफ मेघालय के श्रद्धालुओं के चेहरे पर आराध्य देव के विदा होने का दर्द दिख रहा था तो वहीं गुवाहाटीवासियों को एकबार पुनः अपने आराध्य देव का निकट सान्निध्यता की प्राप्ति को लेकर प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। लगभग 16 किलोमीटर का प्रलंब विहार कर आचार्यश्री गुवाहाटी शहर के हेंगराबाड़ी पहुंचे। यहां विद्या भारती की सहयोगी संस्था शिशु शिक्षा समिति से संबंधित विद्यालय शंकरदेव विद्या निकेतन के छात्र-छात्राओं ने परेड के वाद्य यंत्रों के साथ रैली निकाल और सड़क पर आचार्यश्री की पदयात्रा के साथ कदमताल मिला उनका भव्य स्वागत किया। 
आचार्यश्री के विद्यालय में प्रवेश करते ही विद्यालय की छात्राओं ने समवेत स्वर में विद्या की आराध्य देवी सरस्वती की वन्दना की। आचार्यश्री के प्रवचन स्थल में पधारने पर सनातनी परंपरानुसार एक पुनः छात्राओं ने अपने सुमधुर स्वर में गायत्री मंत्र, शांतिपाठ और स्वागत गीत का संगान कर आचार्यश्री का विद्यालय प्रांगण में मंगल स्वागत किया। 
पूरा विद्यालय प्रांगण विद्यार्थियों, आध्यापक-अध्यापिकाओं सहित श्रद्धालुओं से भरा हुआ था। आचार्यश्री ने विद्यार्थियों को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि जो अविनीत होता है उसे विपत्ति और जो विनीत होता है उसे संपत्ति प्राप्त होती है। आदमी के जीवन में सफलता सक्षम प्रयोग विनय को माना गया है। ‘विद्या विनयेनन शोभते’ सूक्ति वाक्य की व्याख्या करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि विनय से विद्या शोभित होती है। विद्या विनय का आभूषण होता है। विनय के बिना विद्या शोभित नहीं होती। विनय है तो विद्या का अच्छा विकास हो सकता है और विनय नहीं है तो विद्या का विकास या उसका जीवन में आगमन दुर्भर हो सकता है। विद्या विनय से ही ग्रहण होती है। आचार्यश्री ने एक कहानी के माध्यम से उदाहरण देते हुए कहा कि एक राजा को किसी विषय का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हुई। वह उस विषय के विद्वान पंडित से विद्या ग्रहण करना आरंभ तो किया किन्तु, राजा सिंहासन पर और पढ़ाने वाला पंडित नीचे विराजमान होता था। काफी दिन बीत जाने के बाद भी राजा में विद्या का विकास नहीं होने पर वह चिंतित होता है। एक संत के समक्ष अपने प्रश्न को रख राजा जब इसका कारण पूछता है तो राजा ने कहा कि विद्या ऊपर से नीचे की ओर जाती है और आप खुद ऊंचे पर हो और ज्ञान देने वाला नीचे तो ज्ञान की प्राप्ति कैसे हो सकती है। इसलिए गुरु के प्रति विनय का भाव होना चाहिए। गुरु या ज्ञानदाता के प्रति विनय का भाव पुष्ट हो तो विद्या का जीवन में अच्छा विकास हो सकता है। विद्यार्थियों को अभिवादनशील और विनीत बनने के लिए उत्प्रेरित करते हुए कहा कि जो व्यक्ति अभिवादनशील होता है उसका आयुष्य लंबा होता है। उसमें विद्या का विकास होता है और उसके यश और बल में वृद्धि होती है। 
चन्दन पाण्डेय 
आचार्यश्री ने विद्यार्थियों को व्याकरण का ज्ञान ग्रहण करने भी प्रेरणा देते हुए कहा कि भाषा जगत में व्याकरण का बहुत बड़ा महत्त्व होता है। जिसको व्याकरण का ज्ञान नहीं, वह भाषा जगत में अंधे के समान होता है। भाषा की शुद्धता के लिए व्याकरण का ज्ञान आवश्यक होता है। 
परमदयालु ने विद्यार्थियों और इस विद्यालय के प्रति अपनी मंगल भावना व्यक्त करते हुए कहा कि शंकरदेव के नाम से जुड़ा यह विद्यालय है। शंकर अर्थात् सुख प्रदान करने वाला। यहां के छात्रों में विनय के भाव जागृत हो, अहिंसा की भावना प्रबल हो, अच्छे संस्कार आएं और खूब अच्छा विकास करें, मंगलकामना। 
आचार्यश्री ने उपस्थित विद्यार्थियों और अध्यापकों को अहिंसा यात्रा के तीन संकल्प सद्भावपूर्ण व्यवहार करने, यथासंभव ईमानदारी का पालन करने व पूर्णतया नशामुक्त जीवन जीने का संकल्प कराया। जिसे सभी ने सस्वर स्वीकार किया। 
विद्यालय की ओर आचार्यश्री का स्वागत करते हुए विद्यालय की संचालक संस्था शिशु शिक्षा समिति असम के जनरल सेक्रेट्री सदादत्तो ने असमी भाषा में आचार्यश्री का स्वागत करते हुए कहा कि आपके आगमन से विद्यालय परिसर पावन हो गया। आज का दिन हमारे लिए सौभाग्य का दिन है जो आप जैसे महान आचार्य के दर्शन और स्वागत का सुअवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने आशा व्यक्त करते हुए कहा कि आपके आगमन अब विद्यार्थियों के साथ विद्यालय का भी अच्छा विकास हो सकेगा। 
सेवा भारती गुवाहाटी के सचिव श्री प्रदीप नाहटा ने भावनाओं की अभिव्यक्ति देते हुए कहा कि विद्या भारती विद्या के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली संस्था है। असम में इस संस्था द्वारा 485 विद्यालयों का संचालन कर रही है। उन्होंने घोषणा करते हुए कहा कि यहां की शिक्षा कमेटी ने इस विद्यालय में बनने वाले भवन का नाम आचार्यश्री महाश्रमण विद्यालय भवन प्रस्तावित किया है। 
गुवाहाटी ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपने आराध्य देव के स्वागत में अपनी भावांजलि अर्पित की। एक बार पुनः विद्यालय के छात्राओं ने सुमधुर स्वर में राष्ट्रगीत वंदे मातरम का संगान कर सबको भावविभोर कर दिया।



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