साधना की नीव है सम्यक्त्व : आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री की मंगलप्रेरणा से आल्हादित श्रद्धालुओ ने दी भावनाओ की अभिव्यक्ति 

आचार्यश्री महाश्रमणजी
        06.12.2016 धारापुर, गुवाहाटी (असम), धारापुर में ऐतिहासिक चतुर्मास काल परिसम्पन्न कर और इस धरा को तीर्थस्थल के रूप में स्थापित कर छह नवम्बर को यहां से जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता अपनी धवल सेना के साथ अपनी आगे की यात्रा का शुभारम्भ किया। मंगलवार को पुनः मेघालय की राजधानी शिलोंग की ऐतिहासिक यात्रा के साथ एक महीने बाद छह दिसम्बर को जब धारापुर की धरती पर पधारे तो एकबार पुनः धारापुर अपने सौभाग्य पर गौरवान्वित हो उठा। मानों आचार्यश्री अपने द्वारा स्थापित धर्मस्थली को पुनः संभालने और लोगों मनोभाव को पुष्ट करने यहां आए थे। हालांकि इस बार आचार्यश्री के प्रवास का सुअवसर प्राप्त हुआ लेक व्यु आपर्टमेंट को। यहां उपस्थित श्रद्धालुओं को अन्य परिवारों ने आचार्यश्री, असाधारण साध्वीप्रमुखाजी सहित अन्य साधु-साध्वियों का भावभीना स्वागत किया। 
गुवाहाटी नगर स्थित सिग्नेचर एस्टेट से निर्धारित समय पर आचार्यश्री ने धारापुर के लिए विहार किया। रास्ते में मिलने वाले श्रद्धालुओं पर अपनी आशीष वृष्टि करते हुए पुनः धारापुर की ओर अग्रसर हो चले। लगभग चैदह किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री धारापुर हाइवे के किनारे बने लेक व्यु अपार्टमेंट पधारे। 
यहां उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि जैन साधना पद्धति में आश्रव और संवर का ज्ञान अपेक्षित है। साधना के लिए आश्रव से विरत रहना और संवर की साधना करना-ये दो चीजें जीवन में आ जाएं तो निःसंदेह मुक्ति स्वयं व्यक्ति का वरण कर सकती है। साधना का नींव तत्त्व सम्यक्त्व को बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि जैसे मकान की मजबूती और उसकी ऊंचाई उसके नींव पर निर्धारित होती है, उसी प्रकार साधना की ऊंचाई और उत्कृष्टता की नींव में सम्यक्त्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। सम्यक्त्व रत्न के समान है, उससे बड़ा रत्न कोई नहीं। धरती पर तीन रत्न-पानी, अन्न और भाषा से भी बड़ा और महत्त्वपूर्ण रत्न सम्यक्त्व का रत्न होता है।
आचार्यश्री ने सम्यक्त्व को पुष्ट करने की प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी को देव, गुरु और धर्म के प्रति निष्ठावान बनने का प्रयास करना चाहिए। यथार्थ के प्रति श्रद्धा का भाव होना चाहिए। यथार्थ के लिए यदि कभी संप्रदाय को छोड़ना पड़े तो पड़े, पर यथार्थ नहीं छोड़ना चाहिए। हालांकि यह बहुत उच्च स्थिति होती है जब कोई यथार्थ के लिए संप्रदाय को छोड़ता है। संघ की शरण में रहकर आदमी को साधना करने का प्रयास करना चाहिए। 
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त अपने आराध्य देव को अपने घर-आंगन में उपस्थित देख हर्ष से भाव-विभोर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के क्रम में सर्वप्रथम श्री प्रदीप नाहटा ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी। लेक व्यु अपार्टमेंट में रहने वाली बहनों, दूगड़ एवं बोथरा परिवार की महिला सदस्यों ने गीत का संगान कर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया और आचार्यश्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। श्रीमती सुषमा सुराणा और श्रीमती प्रीति पींचा ने भी अपनी भावनाओं की भावांजलि अर्पित की।


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