बुद्धि का प्रयोग समस्याओं के समाधान में करें : आचार्यश्री महाश्रमण

अहिंसा यात्रा पँहुची विजयनगर, दिगंबर जैन मंदिर में हुआ भव्य स्वागत

आचार्यश्री महाश्रमणजी

       07 दिसम्बर 2016 विजयनगर, कामरूप (असम) : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी की अहिंसा यात्रा में असम के महामहिम राज्यपाल श्री बनवारी लाल पुरोहित भी शामिल हुए। वे लगभग एक किलोमीटर तक आचार्यश्री व उनकी सेना के साथ इस कल्याणकारी यात्रा के प्रतिभागी बने। उसके उपरान्त उन्हांेने आचार्यश्री से मंगलपाठ सुना, पावन पथदर्शन प्राप्त कर अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गए। इसके उपरान्त जन कल्याण को लेकर निकले महातपस्वी के गतिमान चरण लगभग पन्द्रह किलोमीटर का विहार कर विजयनगर पहुंचे। जहां दिगम्बर जैन मंदिर प्रांगण में प्रवास किया और वहां उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने मंगलवाणी का रसपान कराया। 
23 मार्च 2016 को असम की सीमा में अहिंसा यात्रा के साथ शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने प्रवेश किया था। तब से लेकर आज तक असम के गांव-गांव, नगर-नगर, शहर-शहर पहुंच कर जन-जन मो मानवता का संदेश देते अखंड परिव्राजक के बढ़ते ज्योतिचरण ने जैसे पूरे असम को पावन कर दिया हो। जन कल्याणकारी इस महान यात्रा और इस यात्रा के प्रणेता प्रभावी प्रवचनकार आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगलवाणी का ही प्रभाव था जो बुधवार को असम के प्रथम नागरिक महामहिम राज्यपाल स्वयं इस यात्रा में शामिल होने के लिए खिंचे चले आए। इस तरह कीर्तिधर पुरुष ने और नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। 
बुधवार को प्रातः की मंगल बेला में जैसे ही आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ धारापुर स्थित लेक व्यू अपार्टमेंट से विहार करने वाले थे कि असम के राज्यपाल श्री बनवारी लाल पुरोहित अपने काफिले के साथ उपस्थित हुए। आचार्यश्री के दर्शन किए और आचार्यश्री के साथ कदम ताल मिलाते हुए निकल पड़े कल्याणकारी अहिंसा यात्रा का हिस्सा बनकर। मानों वे आम जनता को यह संदेश दे रहे थे कि जन-जन के कल्याण को निकली अहिंसा यात्रा के प्रत्येक मानव को जुड़ना चाहिए और अपना कल्याण करना चाहिए। आचार्यश्री के साथ लगभग वे एक किलोमीटर तक चले। इसके उपरान्त उन्होंने आचार्यश्री से मंगलपाठ सुना और पावन पथदर्शन प्राप्त कर गंतव्य को रवाना हो गए। राज्यपाल महोदय प्रस्थान तो कर गए लेकिन आम जनता को महान संदेश दे गए। अहिंसा यात्रा में आम आदमी की तरह पैदल चलते हुए जनता को इस मंगलकारी यात्रा के साथ पूर्ण मनोभाव से जुड़कर अपना कल्याण करने की प्रेरणा दे गए। 
राज्यपाल महोदय के प्रस्थान के उपरान्त आचार्यश्री लगभग पन्द्रह किलोमीटर का विहार कर विजयनगर पहुंचे। जहां दिगम्बर जैन के भगवान पाश्र्वनाथ मंदिर प्रांगण में पहुंचे। जहां श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री का स्वागत किया। मंदिर प्रांगण में बने प्रवचन स्थल में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने अपनी मंगलवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि आदमी को अपने जीवन में पांडित्य का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में ज्ञान का बढ़े और वह आचार में परणित हो तो आदमी का जीवन अच्छा बन सकता है। आचार्यश्री ने पंडित शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि तत्वानुगामी बुद्धि पंडा कहलाती है और जिसके पंडा हो वह पंडित होता है। सामान्यतया पंडित अर्थ ज्ञानी से होता है। इसलिए आदमी को अपने जीवन में ज्ञान और बुद्धि का विकास करना चाहिए। बुद्धि अपने आप में पवित्र तत्व है। आदमी को अपनी बुद्धि का प्रयोग करने में किसी समस्या के समाधान में करना चाहिए न किसी समस्या को पैदा करने में। 
आचार्यश्री ने प्रसंगवश कहा कि कल दिगम्बर जैन परंपरा के आचार्य पुण्यसागरजी से मिलना हो गया। साधु तो चलते-फिरते तीर्थ के समान होते हैं। उनके दर्शन मात्र से भी पुण्य का फल प्राप्त होता है। पूर्व में परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के साथ दिल्ली में विद्यमान विद्यानंद जी महाराज से मिलना होता था।
आचार्यश्री के प्रथम बार विजयनगर में पदार्पण से हर्षित श्रद्धालुओं ने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया। सबसे पहले पटावरी परिवार की बहनों ने आचार्यश्री के स्वागत में गीत का संगान किया। दिगम्बर जैन पंचायत विजयनगर के मंत्री श्री ललित अजमेरा ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हुए कहा कि आचार्यश्री की अहिंसा यात्रा के माध्यम से जो अहिंसा का संदेश फैलाए जाने से यहां की आभा अलौकिक हो गई है। मैं आपका प्रवचन नियमित टीवी पर सुनता हूं। आपके प्रेरणादायी प्रवचन वास्तव में लोगों की दशा को बदलने वाली होती है। आज आपके साक्षात दर्शन और दिगम्बर जैन समाज की ओर से स्वागत कर अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। आचार्यश्री की प्रेरणा से यह पूर्वांचल क्षेत्र प्रकाशित हो उठा है। उन्होंने कहा कि यदि पूरी दुनिया में यदि अहिंसा के साधक और अहिंसा की स्थापना करने वाले संत के रूप में नाम लिया जाए तो आचार्यश्री महाश्रमणजी अहिंसा की स्थापना में प्रतिष्ठित संत हैं। उन्होंने कहा कि आज आपके आगमन से पूरा विजयनगर गौरवान्वित महसूस कर रहा है क्योंकि कल पुण्यसागरजी महाराज का प्रस्थान हो गया और आज आपका आगमन हो गया। संतों की सत्संगति सौभाग्य से प्राप्त होती है। आज हम सभी आपके दर्शन से पवित्रता का अनुभव कर रहे हैं। आप भगवान महावीर सिद्धान्तों और अहिंसा के माध्यम से विश्व में एक नया कीर्तिमान स्थापित करें।


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