राग से त्याग की और बढ़ने का प्रयास करें : आचार्यश्री महाश्रमण

     पूज्य प्रवर ने फ़रमाया की राग के समान दुःख नहीं और त्याग के समान सुख नहीं

आचार्यश्री महाश्रमणजी

     08 दिसम्बर 2016 छयगांव, कामरूप (असम) : मानवता के तीन उद्देश्यों के साथ मानवता के मसीहा आचार्यश्री महाश्रमणजी गुरुवार को कामरूप के शेष भाग को अपने चरणरज से पावन बनाने को निकल पड़े। लगभग पन्द्रह किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री अहिंसा यात्रा के छयगांव पहुंचे। जहां छयगांव स्थित छयगांव कालेज परिसर में आचार्यश्री का प्रवास हुआ। कालेज परिसर में बने सांस्कृतिक भवन में उपस्थित श्रद्धालुओं को दुःख से मुक्त जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान की। 
सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति को जन-जन तक पहुंचाने और मानवता की ज्योति जलाने निकले अखंड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमण 24 मार्च से असम में विहरण कर रहे हैं। जन-जन के हृदय को जागृत करने के लिए असम के विभिन्न जिलों को अपने चरणरज से पावन बनाने के उपरान्त असम के कामरूप जिले के गड़ल, धारापुर में वर्ष 2016 का चतुर्मास परिसम्पन्न किया। उसके उपरान्त मेघालय राज्य की यात्रा आरम्भ हुई। मेघालय की राजधानी शिलोंग जिसे पूर्वोत्तर भारत का स्काॅटलैंड भी कहा जाता है। वहां भी अहिंसा यात्रा ने पहुंचकर लोगों को प्रकृति के मनोहर वातावरण में हृदय के वातावरण को भी मनोहर बनाने का संदेश दिया। शिलोंग की अठारह दिनों की यात्रा ने तेरापंथ धर्मसंघ और मेघालय की धरा पर एक नया कीर्तिमान भी स्थापित किया। अब तक जैन धर्म के किसी भी आचार्य का मेघालय की राजधानी शिलोंग में ऐसी यात्रा के साथ पहला पदार्पण था। तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, कीर्तिधर पुरुष ने शिलोंग की हसीन वादियों तक पहुंच लोगों को आध्यात्मिक जीवन जीने की प्रेरणा देकर एक स्वर्णिम कीर्तिमान भी स्थापित किया। अठारह दिन की यात्रा के पुनः असम की धरा पर पावन चरण का पदार्पण हुआ। फिर गतिमान कदम बढ़ चले उन अनजान राहों पर जो अभी तक शांतिदूत के चरणरज के प्यासे थे। उन क्षेत्रों की प्यास बुझाने को गतिमान चरण गुरुवार को जब विजयनगर से आगे बढ़े तो ठंडी के मौसम ने अपना असर दिखाया और हल्के कोहरे के साथ आचार्यश्री का मानों स्वागत किया। हल्के कोहरे और ठंड के बावजूद ज्योतिचरण के बढ़ते कदमों के प्रकाश से कोहरा छटंता चला गया और छयगांव वालों के लिए सुनहरा सूर्य उदित हुआ जीवन का शायद सबसे स्वर्णिम सवेरा लेकर। 
छयगांव कालेज परिसर में बने सांस्कृतिक भवन में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने अपनी मंगलवाणी से मंगल प्रेरणा देते हुए कहा कि तृष्णा, राग, द्वेष, मोह दुःख का हेतु बनता है। रागी मनुष्य के लिए पदार्थ दुःख का कारण बन जाते हैं। पदार्थ के प्रति आसक्ति हो और वह पदार्थ बिछड़ जाता है तो आदमी को दुःख हो जाता है या जिस पदार्थ को आदमी प्राप्त नहीं करना चाहता और वह प्राप्त हो जाए तो भी आदमी को दुःख हो जाता है। आदमी पदार्थों के प्रति आसक्ति और मोह के कारण दुखी हो सकता है। इसलिए आदमी को दुःख के निवारण के राग-मोह से मुक्त होकर त्याग की ओर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। राग के समान दुःख नहीं और त्याग के समान सुख नहीं। आदमी पदार्थों के प्रति अनासक्त बने, मोह को छोड़ने का प्रयास करे और त्याग की भावना को जागृत करने का प्रयास करे तो वह सुखी बन सकता है। इसलिए आदमी को राग से त्याग की ओर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए और जीवन को सुखी बनाने और स्वयं का कल्याण करने का प्रयास करना चाहिए।


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