मधुर व्यवहार आपसी सौहार्द का आधार : आचार्यश्री महाश्रमण

पुज्यप्रवर ने किया हाजरी पत्र का वाचन, बाल मुनियों से करवाया लेख पत्र का उच्चारण

आचार्यश्री महाश्रमण जी
       13 दिसम्बर 2016 दुधनोई, ग्वालपाड़ा (असम),(JTN), जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी ने मंगलवार को गुरुकुलवास में रहने वाले समस्त साधु-साध्वियों को विशेष प्रदान की। उन्हें आपसी सद्भाव को बढ़ावा देने, व्यवहार को उच्चतापूर्ण बनाने और अर्हतवन्दना और प्रतिक्रमण में शरीर को स्थिर को बनाने का ज्ञान प्रदान किया। ज्ञान प्रदान करने के साथ ही परीक्षा भी ली। इस दौरान ऐसा महसूस हो रहा था जैसे ज्ञान, अध्यात्म और व्यवहार की प्रतिमूर्ति, एक अनुशासनप्रिय धर्मसंघ के अनुशास्ता अपने अनुशासित शिष्यों को प्रेरित कर उन्हें और अधिक अनुशासना में रहने की प्रेरणा प्रदान कर रहे थे। 
मंगलवार को दरंगगिरी से लगभग दस किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ दुधनोई पहुंचे। आचार्यश्री का आज का प्रवास स्थानीय निवासी श्री रवि जैन के आवास में हुआ। जिनके चरणरज को पाने को लाखों श्रद्धालु लालायित रहते हैं, वह ज्योतित चरणरज सहज ही श्री जैन के आवास में पड़े तो पूरा परिवार अपनी कीस्मत पर इतरा उठा।
आवास परिसर में बने प्रवचन स्थल पर जब आचार्यश्री उपस्थित हुए तो आज उनके समक्ष असाधारण साध्वीप्रमुखाजी, मुख्यनियोजिकाजी, साध्वीवर्याजी, मुख्यमुनिश्री सहित गुरुकुलवास के समस्त साधु-साध्वियां भी उपस्थित थे। चतुर्दशी तिथि होने के कारण आज हाजरी का क्रम भी था। आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों पर विशेष कृपा कराई और उन्हें व्यवहार कुशल बनने का ज्ञान प्रदान करते हुए कहा कि आदमी या किसी भी साधु-साध्वी को चिड़-चिड़ा स्वभाव का नहीं होना चाहिए। व्यवहार को अच्छा और मधुरतापूर्ण बनाने का प्रयास करना चाहिए। मधुर व्यवहार आपसी सौहार्द को बढ़ावा देने वाला होता है। छोटी-छोटी बातों पर तनाव नहीं करना चाहिए। लिखित में कोई काम भले ही किसी का हो और उसे कोई और कर दे तो वह कार्य आपसी सौहार्द को बढ़ाने वाला हो सकता है। छोटे साधु-साध्वी को अपने से बड़े साधु-साध्वियों को दिन में एक बार वन्दन अवश्य करना चाहिए। एक बार गुरु का दर्शन और वन्दन करने का भी यथासंभव प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने गुरुकुलवास में रहने को महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि गुरुकुलवासी साधु-साध्वियांे को ज्ञानार्जन का अच्छा अवसर प्राप्त हो सकता है। गुरुमुख का दर्शन का भी सौभाग्य प्राप्त होता है। यदि कोई साधु-साध्वी गुरु का दर्शन किए बिना अन्न-जल न ग्रहण करने का संकल्प ले तो बहुत ऊंची बात हो सकती है। साधु-साध्वियों को एक बार गुरु का अवश्य दर्शन करने का प्रयास करना चाहिए। 
आचार्यश्री ने प्रतिक्रमण और अर्हतवन्दना में साधु-साध्वियों को शरीर को स्थिर रखने और उचित आसन में बैठने का ज्ञान प्रदान करते किया। प्रायोगिक तौर समस्त साधु-साध्वियों को वन्दना की उचित मुद्रा बैठाया और अर्हतवन्दना के एक भाग का समवेत स्वर में उच्चारण भी कराया। ज्ञान प्रदान करने के उपरान्त आचार्यश्री ने बारी-बारी से उसे संक्षिप्त रूप में कुछ साध्वियों से सुना और उसे और स्वयं विस्तारित कर अभिप्रेरणा प्रदान की। अंत में आचार्यश्री ने हाजरी पत्र का वाचन किया तो वहीं बाल मुनि प्रिंसकुमारजी, मुनि केशीकुमारजी और मुनि नमनकुमारजी ने लेखपत्र का उच्चारण किया। इसके उपरान्त समस्त साधु-साध्वियों ने संघ और संघपति के प्रति अपनी निष्ठा, श्रद्धा और समर्पण के संकल्पों को दोहराया, और आचार्यश्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। श्री रवि जैन ने आचार्यश्री के दर्शन कर पावन आशीष प्राप्त किया।



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