विनय धर्मरूपी वृक्ष का मूल है : आचार्यश्री महाश्रमण

-बरसती गुरु कृपा से अभिस्नात हुए ग्वालपाड़ावासी-    
-संसार सागर को तरने के लिए आचार्यश्री ने प्रदान की सम्यक्त्व दीक्षा (गुरुधारणा)-

आचार्यश्री महाश्रमणजी

          17 दिसम्बर 2016 बड़ा बाजार, ग्वालपाड़ा (असम) : असम राज्य का ग्वालापाड़ा जिला मुख्यालय, जहां जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ दो दिवसीय प्रवास कर रहे हैं। ऐसे महानसंत के आगमन से यहां की धरती का कण-कण पुलकीत है। वहीं आचार्यश्री की अमृतमाणी, पावन प्रेरणा से जन-जन आह्लादित है। ग्वालपाड़ा के दो दिवसीय प्रवास के दूसरे दिन शनिवार को आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं पर विशेष कृपा बरसाते हुए उन्हें भव सागर से पार उतारने के लिए सम्यक्त्व दीक्षा (गुरुधाराणा) रूपी पतवार थमाई तो ऐसा लगा मानों मानवाता के मसीहा ने एक साथ कितने संसारी जीवों को भवसागर से पार पाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। ग्वालपाड़ावासी भी गुरुमुख से गुरुधारणा स्वीकार कर अपने जीवन को धन्य मान रहे थे। उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे घर बैठे पधारे भगवान ने उनके जन्म-जन्मांतर की पुण्याई का प्रतिफल दो दिन में प्रदान कर दिया। आचार्यश्री ने लगभग 11.11 बजे उपस्थित समस्त श्रद्धालुओं को देव, गुरु और धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा रखने का संकल्प कराया तथा जीवन की विभिन्न बुराइयों का परित्याग कर धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान की। 
शनिवार को तेरापंथ भवन में परिसर में बने वीर भिक्षु समवसरण के पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को सर्वप्रथम साध्वीवर्याजी ने गुरु की शरण स्वीकार करने की प्रेरणा प्रदान की और ‘हे प्रभो! तुम ही हमारे नाथ हो’ गीत का संगान किया। इसके उपरान्त आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को अपनी मंगलवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि एक वृक्ष में मूल, तना, पत्ते, शाखा व फल आदि होते हैं। एक वृक्ष मंे तना, पत्ते, फल व शाखा आदि की तभी कल्पना की जा सकती है जब मूल होता है। यदि मूल न हो वृक्ष का कोई अस्तित्व नहीं होता। उसी प्रकार धर्म को एक वृक्ष मान लिया जाए तो उसका मूल विनय होता है। आदमी को अपने धर्म रूपी वृक्ष को लहलहाता हुआ देखना है तो विनय रूपी मूल का ध्यान रखना चाहिए। यथार्थ के प्रति सच्ची श्रद्धा और विश्वास ही धर्म का मूल है। धर्म का वृक्ष तभी पुष्पित, पल्लवित हो सकता है जब विनय का मूल सम्यक् तरीके से काम करे। यथार्थ के प्रति आदमी की सच्ची श्रद्धा होनी चाहिए। यथार्थ ही सबका मालिक है। धर्म चाहे कोई भी हो लेकिन सबका मालिक यथार्थ अर्थात सच्चाई ही है। इसलिए यथार्थ के प्रति श्रद्धा और विनय का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। श्रद्धालु यदि अर्हत के प्रति श्रद्धा रखते हैं तो उसके भीतर भी यथार्थ बैठा हुआ होता है। भगवान अर्हत राग-द्वेष से मुक्त यथार्थवादी होते हैं। इसलिए आदमी अर्हत के प्रति विनय, श्रद्धा का भाव रखता है तो वह यथार्थ के प्रति विनय का भाव रख सकता है। वहीं सत्य ही होता है तो जो अर्हतों द्वारा प्रतिपादित होता है। सच्चाई का मार्ग दिखाने वाला धर्म होता है। यथार्थ की साधना करने वाला शुद्ध साधु गुरु होता है, जो जीवन भर के लिए मृषावाद का त्यागी भी होता है। अहिंसा, सत्य और यथार्थ का साधक शुद्ध साधु गुरु हो तो वह कल्याण की दिशा में आगे बढ़ाने वाला हो सकता है। जिनेश्वर के द्वारा बताया गया तत्व आदमी का सिद्धांत और वहीं आदमी धर्म होता है। इसलिए आदमी को देव, गुरु और धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा और विनय का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। यहीं धर्मरूपी वृक्ष का मूल है। 
आचार्यश्री की मंगलवाणी प्राप्त करने के उपरान्त ग्वालपाड़ा महिला मंडल की मंत्री श्रीमती नीतू कोठारी ने कविता पाठ किया। श्री कन्हैयालाल फूलफगर और श्री डूंगरमल भंसाली ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। वहीं श्री महेन्द्र सुराणा ने गीत के माध्यम से अपनी भावांजलि अर्पित की। अंत में मुनि धु्रवकुमारजी ने शनिवार को सायं सात से आठ बजे के बीच सामायिक करने की प्रेरणा प्रदान की।



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