अच्छे कर्मों के माध्यम से संसार समुन्द्र तरने का प्रयास करें : आचार्यश्री महाश्रमण

- ब्रह्मपुत्र नदी पर बने नरनारायण सेतु को पावन कर आचार्यश्री ने किया बंगाईगांव की सीमा में प्रवेश -

- चलंतपारा हायर सेकेण्ड्री स्कूल प्रांगण से अमृतमयी वाणी का कराया रसपान, विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री अब्दुल मन्नफ ने किया आचार्यश्री का स्वागत -

आचार्यश्री महाश्रमणजी

19.12.2016 चलंतपारा, बंगाईगांव (असम) : जन-जन के मन को पावन करने वाली अहिंसा यात्रा अपने प्रणेता, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के साथ सोमवार को ब्रह्मपुत्र नद के ऊपर बने पुल को पार कर पहले जोगीगुफा पहुंची। जहां स्थित स्कूल में कुछ देर प्रवास कर आचार्यश्री अपनी सेना के साथ पुनः विहार किया और लगभग तीन किलोमीटर का विहार कर चलंतपारा हायर सेकेण्ड्री स्कूल पहुंचे। इस प्रकार आचार्यश्री कामरूप और ग्वालपाड़ा जिले में अहिंसा यात्रा के साथ कदम-ताल मिला रहे ब्रह्मपुत्र महानद को पार कर बंगाईगांव जिले की सीमा में आचार्यश्री ने प्रवेश किया। 
सोमवार की प्रातः की मंगल बेला में जब आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ फस्र्ट असम पुलिस टास्क फोर्स कैंप से विहार किया। असम राज्य के कामरूप जिले में आचार्यश्री का चातुर्मासिक प्रवास हो या कामरूप और ग्वालपाड़ा जिले में विहार पूरे दुनिया का एकमात्र महानद ब्रह्मपुत्र जिसे ब्रह्मा का मानस पुत्र भी कहा जाता है अहिंसा यात्रा का सहभागी बना हुआ था। 
सोमवार को आचार्यश्री लगभग सात किलोमीटर का विहार कर ब्रह्मपुत्र महानद पर बने नरनारायण सेतु को अपने चरणरज से पावन किया। 15 अप्रैल 1998 को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा शुभारम्भ किए गए नरनारायण सेतु डबल-डेक पुल है। जिसके ऊपरी हिस्से से हाइवे गुजरता है तो नीचे रेलवे लाइन निकलती है। यह सेतु असम के दो जिले ग्वालपाड़ा और बंगाईगांव को जोड़ने वाला है। आचार्यश्री ने पुल पर से ब्रह्मपुत्र में नौका, हाइवे से गुजरते वाहन और एक बार पुल के नीचले हिस्से से गुजरती ट्रेन से पुल में हुए कंपन को महसूस किया। आचार्यश्री अपने चरणरज इस पुल को पावन कर पुल से करीब कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित जोगीगुफा स्थित एक स्कूल में पधारे। जहां आचार्यश्री कुछ समय विराजमान हुए और पुनः वहां से लगभग तीन किलोमीटर का विहार कर चलंतपारा स्थित चलंतपारा हायर सेकेण्ड्री स्कूल प्रांगण मंे पधार गए। यहां विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री अब्दुल मन्नफ ने आचार्यश्री का स्वागत किया। 
विद्यालय में हो रही परीक्षा के उपरान्त लगभग सवा बारह बजे आचार्यश्री ने अपनी मंगलवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि शरीर एक नौका के समान है। जीव उसका नाविक और संसार समुद्र के समान है। महर्षि और संत लोग इसके माध्यम से संसार रूपी समुद्र को तर जाते हैं। आदमी को अपनी शरीर रूपी नौका के माध्यम से इस संसाररूपी समुद्र को तर जाने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए आदमी को अच्छे कर्म करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने कहा कि जब आदमी जन्म लेता है तो मृत्यु भी निश्चित होनी है। संसार में शायद ऐसा कोई व्यक्ति जो शायद यह कह सके मेरी मृत्यु के साथ दोस्ती हो गई, मेरी मौत नहीं हो सकती, या कोई ऐसा नहीं कह सकता कि मैं भागकर अपने अपने आपको मृत्यु से बचा सकता हूं। कोई मृत्यु के समक्ष मुंह मंे तिनका रख गाय बन जाए तो भी मृत्यु उसे छोड़ने वाली नहीं है। इसलिए आदमी को अच्छा कर्म के माध्यम से इस संसार रूपी समुद्र को तरने का प्रयास करना चाहिए। 
आचार्यश्री ने प्रसंगवश कहा कि आज मैं ब्रह्मपुत्र नद को पार किया। शायद मैंने बचपन में सुना था कि असम या अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के जाने के ब्रह्मपुत्र को पार करना पड़ता है। ऊपर राजपथ, नीचे लौहपथगामिनी का मार्ग और नीचे जल। आज मैंने एक बार से ब्रह्मपुत्र में नौका को चलते देखा, राजपथ से गुजरते वाहनों को देखा और नीचले हिस्से से गुजरती लौहपथगामिनी की ध्वनि भी सुनी। एकबार लौहपथगामिनी के आगमन पुल में कंपन महसूस हुआ तो मैं वहां रूका भी बाकी संत भी रूके। इस प्रकार ऐसा कम अवसर मिलता है जब ऊपर राजपथ, नीचे लौहपथ और उसके नीचे पानी में चलती नौका आदि को एक साथ देखा या महसूस किया जा सके। 
आचार्यश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को अहिंसा यात्रा के शुभारम्भ, उसके तीन मुख्य उद्देश्यों के साथ जैन साधुचर्या के विषय में भी अवगति प्रदान की। 
आचार्यश्री की मंगलवाणी के उपरान्त आचार्यश्री का अपने विद्यालय में स्वागत करते हुए विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री अब्दुल मन्नफ ने कहा कि आपके स्कूल में पदार्पण से मैं अभिभूत हूं और आपका आभार प्रकट करता हूं। आपके आगमन से हमारा विद्यालय पावन और पवित्र हो गया है। मैं अपने विद्यालय में आपका हार्दिक स्वागत अभिनंदन करता हूं। इसके उपरान्त श्री पदमचंद सुराणा ने भी आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावानाओं की अभिव्यक्ति दी और शुभाशीष प्राप्त किया।

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